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पुलवामा की शहादत और पाकिस्तान से क्रिकेट मैच: भावनाएं बनाम खेल की मर्यादा, आखिर सही क्या?

@विनोद भगत

14 फरवरी 2019… यह तारीख देश कभी नहीं भूल सकता। पुलवामा में हुए भीषण आतंकी हमले ने पूरे भारत को झकझोर दिया था। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 40 से अधिक जवान शहीद हो गए थे। इसकी जिम्मेदारी पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी।

आज 14 फरवरी को पूरा देश उन वीर सपूतों को नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। सोशल मीडिया पर संदेश, मोमबत्ती मार्च, श्रद्धांजलि सभाएं—हर ओर शहीदों के प्रति सम्मान का भाव दिखाई दे रहा है। लेकिन इसी भावनात्मक माहौल के बीच एक सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है।

15 फरवरी: भारत बनाम पाकिस्तान क्रिकेट मैच

कल 15 फरवरी को भारतीय क्रिकेट टीम का मुकाबला पाकिस्तान से होना है। यह मुकाबला केवल एक खेल नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच दशकों से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक भी माना जाता है।

ऐसे में कई लोग सवाल उठा रहे हैं—
जिस देश को हम आतंकवाद का संरक्षक कहते हैं, उसी देश के साथ खेल प्रतियोगिता क्यों?
क्या यह शहीदों की भावनाओं के विपरीत नहीं है?

खेल और राजनीति: अलग या जुड़ा हुआ?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अक्सर कहा जाता है कि “खेल को राजनीति से अलग रखना चाहिए।” खेल कूटनीति (Sports Diplomacy) को कई बार देशों के बीच संवाद का माध्यम भी माना गया है। क्रिकेट विशेषकर भारत और पाकिस्तान के बीच भावनाओं से जुड़ा विषय है।

भारत-पाक मैच हमेशा उच्च सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आयोजित होते हैं। द्विपक्षीय सीरीज वर्षों से बंद हैं, लेकिन आईसीसी या एशियाई टूर्नामेंटों में दोनों टीमें आमने-सामने आती हैं।

यहां तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि भारत अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेलने से इनकार करता है, तो इसका असर अंक तालिका, आयोजन और वैश्विक क्रिकेट राजनीति पर पड़ सकता है।

जनता की भावनाएं: विरोधाभास क्यों?

एक ओर लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं, दूसरी ओर उसी उत्साह से मैच देखने की तैयारी भी करते हैं। यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है—

  • क्या हमारी भावनाएं क्षणिक हैं?
  • क्या खेल का रोमांच देशभक्ति की भावना पर भारी पड़ जाता है?
  • या फिर हम खेल को केवल खेल की तरह देखना चाहते हैं?

कुछ लोग मानते हैं कि मैदान में भारत की जीत भी एक तरह से देश का मनोबल बढ़ाती है। वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि जब तक आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार का खेल संबंध उचित नहीं।

सरकार और खेल संस्थाओं की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) और अन्य खेल संस्थाएं टूर्नामेंट के शेड्यूल तय करती हैं। सरकार की अनुमति और सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी के बाद ही ऐसे मैच खेले जाते हैं।

भारत ने पहले भी कई बार कड़े रुख अपनाए हैं और द्विपक्षीय क्रिकेट संबंधों को निलंबित रखा है। लेकिन बहुपक्षीय टूर्नामेंट में भागीदारी एक अलग विषय है, जहां राष्ट्रीय हित, कूटनीति और खेल भावना—तीनों का संतुलन साधना पड़ता है।

भावनाओं का सम्मान, विवेक का निर्णय

पुलवामा के शहीदों का बलिदान अमिट है। उनका सम्मान केवल एक दिन की श्रद्धांजलि से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सजगता और जिम्मेदार नागरिकता से होना चाहिए।

जहां तक क्रिकेट मैच का सवाल है, यह बहस केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नीतिगत भी है। क्या खेल को पूरी तरह राजनीति से अलग रखा जा सकता है? या फिर कुछ परिस्थितियों में कठोर निर्णय जरूरी होते हैं?

इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं। लेकिन इतना तय है कि शहीदों की स्मृति हमारे राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा है—और हर निर्णय में उस स्मृति का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।

अब सवाल आपसे—क्या भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मुकाबले जारी रहने चाहिए, या फिर पुलवामा जैसी घटनाओं के बाद इन्हें पूरी तरह रोक देना चाहिए?

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