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विरोधाभास :आरोपी पत्रकार और आरोपी नेता का फर्क, लोकतंत्र का प्रहरी कौन?

@विनोद भगत

लोकतांत्रिक समाज में आरोप-प्रत्यारोप एक सामान्य प्रक्रिया है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ति जितना प्रभावशाली होता है, उस पर लगने वाले आरोप उतने ही तेज़ और व्यापक होते हैं। लेकिन एक रोचक और चिंताजनक विरोधाभास अक्सर देखने को मिलता है। जब किसी नेता पर आरोप लगते हैं तो उसकी पार्टी, संगठन और समर्थक खुलकर उसके बचाव में सामने आ जाते हैं, वहीं जब किसी पत्रकार पर आरोप लगते हैं तो प्रायः पत्रकार जगत से वैसा समर्थन दिखाई नहीं देता। हाँ, समाज के कुछ जागरूक नागरिक अवश्य उसके पक्ष में चर्चा करते नज़र आते हैं। यह अंतर केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि व्यवस्था और मानसिकता का भी है।

राजनीतिक दल संगठन आधारित होते हैं। नेता पर आरोप लगना पार्टी की साख, सत्ता और भविष्य से जुड़ा होता है। इसलिए पार्टी उसे व्यक्तिगत मामला न मानकर सामूहिक हमला समझती है। प्रवक्ता बयान देते हैं, कार्यकर्ता सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक सक्रिय हो जाते हैं और आरोपों को साजिश बताने का प्रयास होता है। यहाँ समर्थन का आधार अक्सर आरोप की सत्यता नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी और हित होते हैं।

इसके उलट पत्रकारिता एक ऐसा पेशा बन गया है जहाँ सामूहिकता लगातार कमजोर हुई है। अधिकांश पत्रकार किसी न किसी संस्थान से जुड़े होते हैं और उनकी प्राथमिक जवाबदेही संस्थान के प्रति होती है, न कि अपने पेशे के साथी के प्रति। यूनियन और संगठनों का प्रभाव सीमित हो चुका है। प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि सहयोग की भावना पीछे छूटती जा रही है। ऐसे में जब किसी पत्रकार पर आरोप लगते हैं, तो दूसरे पत्रकार दूरी बना लेना ही सुरक्षित समझते हैं।

इस चुप्पी के पीछे भय भी काम करता है। समर्थन करने का अर्थ सत्ता, प्रबंधन या प्रभावशाली वर्गों की नाराज़गी मोल लेना हो सकता है। आज का पत्रकार जानता है कि एक ट्वीट, एक बयान या एक सार्वजनिक समर्थन उसके करियर पर भारी पड़ सकता है। इसलिए “कल मेरी बारी न आ जाए” की आशंका उसे मौन रहने को मजबूर कर देती है।

पत्रकारिता के भीतर मौजूद आपसी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा भी इस स्थिति को और जटिल बना देती है। पद, पहचान, पहुँच और लोकप्रियता को लेकर एक अदृश्य संघर्ष चलता रहता है। कई बार किसी पत्रकार पर लगे आरोपों को कुछ लोग एक अवसर की तरह देखते हैं, जहाँ सहानुभूति की जगह संतोष की भावना पैदा हो जाती है। यह मानसिकता पेशे को भीतर से खोखला करती है।

अक्सर निष्पक्षता का तर्क देकर भी समर्थन से बचा जाता है। कहा जाता है कि पत्रकार को किसी के पक्ष में नहीं बोलना चाहिए। लेकिन यह निष्पक्षता तब संदिग्ध हो जाती है जब वही पत्रकार सत्ता या संगठनों के खुले बचाव को सामान्य मान लेते हैं। वास्तव में समर्थन का अर्थ किसी अपराध को सही ठहराना नहीं, बल्कि यह कहना है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और किसी को बिना प्रमाण दोषी न ठहराया जाए।

ऐसे समय में जब पत्रकार साथ नहीं खड़े होते, तब समाज के कुछ जागरूक नागरिक उसके समर्थन में आवाज़ उठाते दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि आम जनता आज भी पत्रकार को सवाल पूछने वाला, सत्ता को आईना दिखाने वाला मानती है। लोग समझते हैं कि यदि आज एक पत्रकार को बिना समर्थन के दबा दिया गया, तो कल आम आदमी की आवाज़ भी कमजोर पड़ जाएगी।

इस प्रवृत्ति का सबसे गंभीर असर लोकतंत्र पर पड़ता है। पत्रकारों की आपसी चुप्पी सत्ता को यह संकेत देती है कि मीडिया को विभाजित कर के नियंत्रित किया जा सकता है। भय और आत्म-सेंसरशिप का माहौल बनता है और धीरे-धीरे पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगती है। जब पत्रकार अकेला पड़ता है, तो सच भी अकेला पड़ जाता है।

आवश्यक है कि पत्रकार व्यक्ति नहीं, पेशे की गरिमा के लिए खड़े हों। समर्थन का अर्थ पक्षपात नहीं, बल्कि न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रक्रिया की मांग है। यदि पत्रकार अपने ही पेशेवर साथियों के लिए आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो उनसे समाज के लिए निर्भीक आवाज़ उठाने की उम्मीद भी कमजोर होती जाएगी। लोकतंत्र को मजबूत रखने के लिए पत्रकारों का एक-दूसरे के साथ खड़ा होना उतना ही जरूरी है, जितना सच के साथ खड़ा होना।

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