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व्यंग्य लेख : “झूठ बोले कौवा…, बेखौफ होकर झूठ बोलिए कौवा नहीं काटेगा पर वफादार कुत्तों से सावधान रहें

@विनोद भगत

बचपन से हमें डराया जाता रहा है—“झूठ बोले कौवा काटे”। माता-पिता ने यही कहकर हमें सच बोलने का पाठ पढ़ाया। मगर आज तक किसी ने सुना या देखा कि किसी झूठे को कौवे ने सचमुच काट लिया हो? कुत्ते काटते हैं उन्हें वफादार कहा जाता है। लेकिन कौवे को काटने वाला बताया जाता है। अगर सच में कौवा काटने लगे झूठ बोलने वाले को तो सरकारी और निजी अस्पताल में भीड़ लगी होती। कौवा काटने के इंजेक्शन बनाने पड़ते। और इतने इंजेक्शन बनाने पड़ते कि अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाती।

असलियत यह है कि कौवे इतने समझदार जीव हैं कि उन्होंने साफ कह दिया है—“भाई, हमें इसमें मत घसीटो। काटना हमारा काम नहीं है।” लेकिन कहावत बनाने वालों ने उन्हें यूँ बदनाम कर दिया मानो कौवे का पूरा जीवन-उद्देश्य ही झूठ पकड़ना हो।

अगर यह कहावत सच होती, तो संसद से लेकर पंचायत तक, अदालत से लेकर अख़बार के दफ़्तर तक, हर जगह कौवों की फ़ौज तैनात होती। टीवी डिबेट में एंकर के पास माइक होता और मेहमानों के सिर पर कौवे। झूठ बोलते ही लाइव काट-पीट मच जाती। लेकिन कौवे भी जानते हैं कि इंसानों की राजनीति और झूठ के मामले में पड़ना उनके बस की बात नहीं।

अब सोचने वाली बात यह है कि यही कौवा जब श्राद्ध कर्म के समय आता है तो उसे हमारे और पूर्वजों के बीच सेतु माना जाता है। माना जाता है कि कौवे को जो अर्पण मिलता है, वही हमारे पितरों तक पहुँचता है। यानी कौवा सिर्फ साधारण पक्षी नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ प्रतीक भी है। ऐसे में उस पर यह ठप्पा लगा देना कि वह झूठ पकड़ता है और काटता है, कहीं न कहीं भावनाओं को आहत करने जैसा है।

और सच कहें तो कौवे अब पहले की तरह दिखते भी कहाँ हैं? शहरों में उनकी संख्या घट रही है। शायद यही उनकी नाराज़गी है। वे कह रहे हैं—“तुम इंसान हमारी जगह-जगह छवि बिगाड़ते हो, झूठ से जोड़ते हो, और ऊपर से हमें गायब भी कर रहे हो। अब हम क्या करें?”

तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि झूठ और सच का हिसाब-किताब इंसानों को ही करना होगा। कौवे पर बेवजह आरोप लगाना बंद कीजिए। बेचारे पक्षी पर इतने आरोप क्यों मढ़े जाएँ, जो असल में हमारे पूर्वजों तक हमारा संदेश पहुँचाने का ज़रिया है।

कहावत को अब नया रूप देना चाहिए—“झूठ बोले, तो खुद काटे झेंप।” इसलिए बेखौफ होकर झूठ बोलिए कौवा नहीं काटेगा आपको।
कौवे को बदनाम करने का काम छोड़ दीजिए, नहीं तो सचमुच वे नाराज़ होकर पूरी तरह गायब हो जाएँगे।जो भी इन पंक्तियों को पढ़ चुके हैं वह खुद सोचें कि उन्हें या उनके आसपास कितने लोगों को कौवे ने काटा है। अब अगर कौवे ने नहीं काटा तो इसका सीधा सा अर्थ है कि आप और आपके आसपास रहने वाले लोगों में से कोई झूठा है ही नहीं।

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