@शब्द दूत ब्यूरो (05 सितंबर 2025)
काशीपुर। समाजसेवी एवं डी- बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने समाज में बदलते रिश्तों और बुजुर्गों के प्रति उदासीन रवैये पर गहरी चोट करते हुए कहा कि जब बुजुर्ग जीवित रहते हैं तब उनकी सेवा-सुश्रुषा करने से लोग कतराते हैं, लेकिन मृत्यु के बाद उनके श्राद्ध के नाम पर बड़े आयोजन कर दिखावा करते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब साक्षात् भूखे-प्यासे बुजुर्गों को खिलाया-पिलाया नहीं गया तो अब मरने के बाद कौवों, गायों और ब्राह्मणों को भोजन कराने का क्या औचित्य है? यह कैसी विडंबना है कि जिन माता-पिता ने सेवा के अभाव में तड़पकर इस दुनिया को अलविदा कहा, उनकी याद में स्वादिष्ट पकवान बनाकर पशु-पक्षियों को खिला दिया जाता है। क्या इससे उनकी आत्मा को वास्तव में शांति मिल पाएगी?
श्रीमती बाली ने कहा कि असली श्रद्धा मृतकों के नाम पर थाली सजाने में नहीं, बल्कि जीवित बुजुर्गों की थाली भरने में है। भगवान को पूजा-पाठ और दिखावे की थालियों की आवश्यकता नहीं है। भगवान तब प्रसन्न होते हैं जब हम अपने माँ-बाप और जरूरतमंदों की सेवा करते हैं।
उन्होंने कहा कि अफसोस की बात है कि माता-पिता जीवित रहते हैं तो उनकी दवाइयों और जरूरतों को बोझ समझा जाता है, लेकिन मृत्यु के बाद उनके नाम पर श्राद्ध और दान-दक्षिणा पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। इस तरह का पाखंड समाज में बढ़ती संवेदनहीनता को दर्शाता है।
उर्वशी दत्त बाली ने आह्वान किया कि यदि सच में पुण्य कमाना है तो श्राद्ध पक्ष में दिखावे के आयोजन करने की बजाय अपने माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा कीजिए, उन्हें प्यार और सम्मान दीजिए। यही असली श्रद्धा है और यही असली श्राद्ध है।
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