@विनोद भगत
उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा के नेतृत्व को अब पर्याप्त समय हो चला है कि उसकी कार्यक्षमता और संगठन पर प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके। लेकिन दुर्भाग्यवश, इस अवधि में कांग्रेस की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखाई देता। जिस ऊर्जा और संकल्प के साथ उन्होंने अध्यक्ष पद संभाला था, वह समय के साथ क्षीण होती नजर आ रही है। जहां से चले थे वहीं पर टिके हुए हैं।
प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव चल रहे हैं दावा कांग्रेस का है कि वह पहले से बेहतर करने जा रही है। ऐसा दावा हर चुनाव से पहले कांग्रेस करती आई है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
इसमें कोई शक नहीं कि करन माहरा निर्विवाद रूप से एक सौम्य, ज़मीनी और संयमी नेता हैं। उनके भीतर संगठन के प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में सरलता है, जो एक नेता की अच्छी विशेषताएँ मानी जाती हैं। लेकिन आज की राजनीति में नेतृत्व का मतलब केवल छवि नहीं, बल्कि प्रभाव, निर्णय क्षमता और जन-आंदोलन खड़ा करने की ताकत भी है। और इसी मोर्चे पर माहरा नेतृत्व पिछड़ता दिख रहा है।
प्रदेश में भाजपा की आक्रामक रणनीतियों, सोशल मीडिया की पकड़ और ज़मीनी कार्यकर्ताओं की फौज के सामने कांग्रेस का ढीला संगठन और असहज चुप्पी साफ दिखाई देती है। पेपर लीक घोटाले हों या महंगाई के सवाल, कांग्रेस का विरोध केवल प्रेस कांफ्रेंस और ट्वीट तक सिमटकर रह गया है। जनता तक पहुंचने, उन्हें आंदोलित करने, और कांग्रेस को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने का ज़िम्मा जो नेतृत्व को निभाना था, वह अब तक अधूरा है। बयानबाजी भी कई बार ऐसे छुटभैय्ये नेता कर रहे हैं जिनकी अपनी कोई जमीन नहीं है। ऐसे में जनता में कांग्रेस को लेकर धारणा बदलती नहीं दिखाई दे रही है। हां सेल्फी पसद छुटभैय्ये नेता बड़े बड़े नेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर खुद को कांग्रेस का हितैषी साबित करने का असफल प्रयास कर रहे हैं।
इसके साथ ही कांग्रेस की पुरानी बीमारी—गुटबाज़ी और आपसी खींचतान—आज भी वैसी ही बनी हुई है। वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय की कमी, अवसरवादी चुप्पी और सामूहिक रणनीति के अभाव ने पार्टी की साख को और कमजोर किया है। संगठनात्मक ढांचा भी कहीं निष्क्रिय, कहीं बिखरा हुआ नजर आता है। जिलों और ब्लॉकों में पार्टी की गतिविधियाँ बेहद कमज़ोर हो चुकी हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि करन माहरा अब तक अपनी सादगी और संयम के गुणों को संगठित ताकत में नहीं बदल सके। और यह भी एक कटु सत्य है कि उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद सजग राज्य में विपक्ष यदि कमजोर है, तो सत्तारूढ़ दल को खुली छूट मिलती है।
अब वक्त आ गया है कि कांग्रेस आत्ममंथन करे, और करन माहरा नेतृत्व केवल चेहरे तक सीमित न रहकर जमीनी संघर्ष का प्रतीक बने। अगर 2027 की तैयारी करनी है, तो नेतृत्व को सिर्फ बयान नहीं, आंदोलन करना होगा। संगठन को फिर से जीवंत करना होगा।
वरना कांग्रेस की गति एक ढलती हुई परछाई की तरह होती जाएगी—जिसे सब देखेंगे, पर कोई गंभीरता से नहीं लेगा। साथ ही जगह जगह पर नये आये अवसरवादी तथाकथित नेताओं पर लगाम कसनी होगी जिनकी वजह से पार्टी की प्रदेश के अलग अलग इलाकों में फजीहत हो रही है। पहले से स्थापित पार्टी नेताओं को दरकिनार करना भी पार्टी के लिए अच्छा संदेश नहीं है।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal