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उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला: प्रकृति, परंपरा और पर्यावरण चेतना का उत्सव, मात्र त्यौहार नहीं है ये

@शब्द दूत ब्यूरो (07 जुलाई 2025)

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में लोकपर्वों का विशेष स्थान है। इन्हीं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है ‘हरेला’, जो न केवल कृषि और पर्यावरण से जुड़ा है, बल्कि लोकसंस्कृति, पारिवारिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक भी है। ‘हरेला’ शब्द संस्कृत के ‘हरित’ से बना है, जिसका अर्थ है – हरा या हरियाली।

हरेला पर्व मुख्यतः कुमाऊं अंचल में श्रावण मास के पहले दिन अर्थात श्रावण संक्रांति को मनाया जाता है। यह आमतौर पर 16 जुलाई से 18 जुलाई के बीच आता है। इसे मानसून के स्वागत और नवनवांकुरित जीवन के उत्सव के रूप में देखा जाता है।

कहा जाता है कि यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की स्मृति में मनाया जाता है। हरेला को उत्तराखंड के लोग प्रकृति पूजन, हरियाली का अभिनंदन और जीवन के नए चक्र की शुरुआत के रूप में देखते हैं।

हरेला पर्व से दस दिन पहले घरों में छोटे लकड़ी के टोकरे, बांस की टोकनी या थालियों में मिट्टी भरकर उसमें धान, मक्का, गहत, उड़द, तिल और सरसों आदि के बीज बोए जाते हैं। इन्हें घर की महिलाएं और बच्चे मिलकर सींचते हैं।

श्रावण संक्रांति के दिन, जब इन बीजों से 4 से 6 इंच ऊँची हरी-हरी पौध निकल आती है, तब इन्हीं को ‘हरेला’ कहा जाता है। इस दिन हरेला काटा जाता है और घर के बुजुर्ग सभी परिवारजनों के सिर पर तीन बार हरेला घुमाकर आशीर्वाद देते हैं –

लाग हरैला, लाग बग्वाल जी रया, जागि रया, अगास बराबर उच्च, धरती बराबर चौड है जया, स्यावक जैसी बुद्धि, स्योंक जस प्राण है जो, हिमाल म ह्यु छन तक, गंगज्यू म पाणि छन तक, यो दिन, यो मास भेटने रया

> “जीते रहो, फलो-फूलो, खूब बढ़ो, खेती-बाड़ी करो, वृक्ष लगाओ, धरती को हराभरा रखो।”

हरेला के अवसर पर नृत्य-गान, पारंपरिक व्यंजन, लोककला और गीतों का आयोजन होता है। कई स्थानों पर हरेला मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें हस्तशिल्प, लोककला और स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी होती है।

बच्चों द्वारा पेड़-पौधे लगाना, गांव की साफ-सफाई करना और पर्यावरणीय संदेशों के साथ झांकी निकालना भी पर्व का हिस्सा बनता जा रहा है।

हरेला सिर्फ एक लोकपर्व नहीं, बल्कि यह पर्यावरण के प्रति उत्तराखंड की सदियों पुरानी चेतना का परिचायक है। वर्तमान में, जब पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है, तब हरेला जैसे पर्व की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

राज्य सरकार और स्वयंसेवी संगठन इस दिन वृहद वृक्षारोपण अभियानों का आयोजन करते हैं। स्कूलों में बच्चों को पौधे वितरित किए जाते हैं और उन्हें संरक्षण की शपथ दिलाई जाती है।

हरेला से जुड़े अनेक लोकगीत आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। एक प्रचलित कहावत है –

> “सालों साल हरेला ब्वे, स्याव घुगुति खाल ब्वे।”
(साल दर साल हरेला आता रहे, और हम घुगुती (पक्षी) के समान स्नेहपूर्वक जीवन जीते रहें।)

हरेला पर्व उत्तराखंड की लोकआस्था, पारिवारिक मूल्यों, कृषि-परंपरा और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का अनूठा संगम है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि मानव जीवन और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐसे पर्वों के माध्यम से हम अपनी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं और भावी पीढ़ी को भी इस परंपरा का हिस्सा बना सकते हैं।

उत्तराखंड में हरेला न केवल एक त्यौहार है, बल्कि यह हरियाली की कामना, समृद्धि का आशीर्वाद और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का लोक-प्रदर्शन है। इसे सहेजना, मनाना और अगली पीढ़ी को सौंपना हमारी सांस्कृतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है।

 

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