@शब्द दूत ब्यूरो (01 जुलाई 2025)
काशीपुर। डोर टू डोर कूड़े की गाड़ी नगर निगम व्यर्थ ही चला रहा है शहर की कालोनियों के बाहर सड़क पर कूड़े के ढेर देखकर तो ऐसा ही लगता है। शहर की साफ-सफाई व्यवस्था को लेकर सबसे आसान काम है – दोषारोपण। खासकर नगर निगम को कटघरे में खड़ा कर देना। गंदगी फैली है?—निगम निकम्मा है। नालियाँ चोक हैं?—निगम क्या कर रहा है? सड़कों पर प्लास्टिक के ढेर हैं?—निगम पर सवाल। लेकिन क्या कभी हम खुद से सवाल करते हैं कि इन समस्याओं के पीछे कहीं हम खुद तो नहीं?
वास्तविकता यह है कि समस्याओं का बड़ा हिस्सा हमारी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार से उपजता है। हम ही हैं जो दिनभर का कूड़ा एक पॉलीथीन में भरकर सीधे नाली में डाल देते हैं। पत्तियाँ, प्लास्टिक के कप, रैपर, रसोई का कचरा—सब कुछ सीधे नालियों में फेंक दिया जाता है। परिणामतः जब बरसात आती है और ये नालियाँ उफनने लगती हैं तो हम आँख मूँदकर नगर निगम को दोषी ठहरा देते हैं।
सड़क पर चलते हुए प्लास्टिक की बोतल खत्म होते ही उसे किसी कूड़ेदान की जगह फुटपाथ या नाली में फेंक देना आम आदत बन चुकी है। फल-सब्जी के छिलके, चाय के कप, सिगरेट के टुकड़े—हर छोटी चीज हमारे आसपास की सफाई व्यवस्था को गंदा कर रही है। लेकिन हमें चिंता नहीं, क्योंकि सफाई तो ‘निगम का काम’ है।
बात यहीं खत्म नहीं होती। कई लोग अपने घरों के सामने की नालियों को ‘ढकने’ के नाम पर पक्के स्लैब डाल देते हैं। नतीजा यह कि नालियाँ बंद हो जाती हैं, पानी का बहाव रुक जाता है, और धीरे-धीरे यह एक बदबूदार समस्या बन जाती है। फिर यही लोग शिकायत करते हैं कि “सफाई नहीं होती”, “मच्छर बहुत हैं”, “बदबू आती है”—लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि नाली पर स्लैब डालने का विचार किसका था?
नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन सवाल तब ही सार्थक होते हैं जब हम स्वयं की भूमिका भी ईमानदारी से जांचें। यह याद रखना होगा कि कोई भी संस्था अकेले शहर को साफ नहीं रख सकती, जब तक नागरिक स्वयं अनुशासित, जिम्मेदार और जागरूक न हों।
समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है, मानसिकता की भी है। हमें समझना होगा कि नगर निगम कोई जादू की छड़ी नहीं है जो हर कूड़े को एक झटके में गायब कर देगा। जब तक हम सड़क पर थूकना बंद नहीं करेंगे, कूड़ा कूड़ेदान में नहीं डालेंगे, नाली को नाली ही रहने देंगे, तब तक कितनी भी सफाई कर्मी नियुक्त कर लिए जाएँ—शहर साफ नहीं होगा।
शहर हमारा है, नालियाँ हमारी हैं, सड़कें हमारी हैं, और जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए। जब तक हम नागरिक अपने हिस्से की जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तब तक ‘कोसने’ का यह सिलसिला चलता रहेगा—और समस्याएँ भी।
इसलिए आइए, कोसने से पहले सोचें। क्योंकि जो गंदगी हम फैला रहे हैं, उसकी सफाई की पहली ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है। और हाँ ऐसा नहीं है कि हर नागरिक इस गंदगी को फैलाने का जिम्मेदार है। कुछ ऐसे भी हैं जो सफाई का ध्यान रखते हैं। जैसे इन पंक्तियों को जो पढ़ रहे हैं वह उन लोगों में से हैं जो गंदगी नहीं फैलाते।
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