@शब्द दूत ब्यूरो (24 दिसंबर 2024)
काशीपुर । शहर में जलभराव सबसे बड़ी समस्या है जिससे स्थानीय नागरिक हर बरसात में जूझते हैं। यहाँ तक कि नगर निगम के मेयर चुनाव में में यह एक प्रमुख मुद्दा रहता है। चुनाव में खड़े हर प्रत्याशी को इस मुद्दे पर नागरिकों के सवालों का सामना करना पड़ता है लेकिन यह मुद्दा है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
जलभराव के चलते न केवल आम नागरिकों वरन शहर के व्यापारियों को प्रत्येक बरसात में लाखों का नुकसान झेलना पड़ता है। वादा तो कर देते हैं जलभराव से निजात दिलाने का लेकिन हकीकत में खुद मेयर को नहीं पता कि इस समस्या का समाधान आखिर है क्या? सवाल यह भी है कि जलभराव का जुल्म करने वाला मुजरिम आखिर कौन है?
शहर में बढ़ते मकानों के लिए जमीन की जरूरत थी। जिसके लिए शहर के तालाबों पर कालोनाइजर्स की नजर पड़ी। ये वो तालाब थे जिनमें बरसात के पानी का संचय होता था और कितनी भी बरसात हो पानी शहर में भरने की जगह इन तालाबों में समा जाता था। जैसे जैसे तालाब पाटकर वहाँ रिहायशी कालोनियां बनने लगी तो पानी भी उन कालोनियों में भरने लगा जिसका परिणाम जलभराव के रूप में सामने आया।
काशीपुर में एक समय था जमाना था क्षेत्र में 13 तालाब थे। जिसमें गर्मी बेहाल लोग तैरते थे तो बारिश का पानी संचय होता था। पालतू पशुओं को नहलाया जाता था। धोबी कपड़े धोते थे। बारिश का पानी संचय होता था तो शहर में जलभराव की समस्या नहीं होती थी। भूजल स्तर भी ऊपर रहता था। तालाबों पर भूमाफिया की नजर पड़ी तो फिर प्रशासन की मिलीभगत से उन पर काबिज होकर कालोनियां काट दी गई। इससे तालाबों के नामोनिशान खत्म हो गए तो कुछ तालाब खत्म होने की स्थिति में हैं। इसका खामियाजा जनता को जल भराव की समस्या से जूझना पड़ रहा है।
उस समय काशीपुर को बागानों व तालाबों का शहर भी कहा जाता था। बताया जाता है कि यहां पर कुल 13 तालाब थे। आज आपको वह तालाब ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। इन तालाबों में स्पोर्ट्स स्टेडियम के सामने आधा से एक एकड़ के दो तालाब, टांडा उज्जैन में आधा से एक एकड़ के छह तालाब, महेशपुरा में एक से दो एकड़ के तीन तालाब, करीब आठ एकड़ का कटोराताल व करीब 15 एकड़ का एक खोखरा ताल था। जी हाँ तालाब थे अब आपको वहाँ कालोनाइजर्स की बदौलत कंक्रीट के जंगल जैसे होटल, दुकान व अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान नजर आयेंगे।
इसके कारण भूजल स्तर भी प्रभावित हुआ है। इसमें कोई शक नहीं कि जलभराव की समस्या भी तालाबों के खत्म होने के भी दुष्परिणाम है। आखिर तालाब पाटने का विरोध स्थानीय जनता क्यों नहीं कर पाई ये भी एक बड़ा सवाल है।
दर असल जिन कालोनाइजर्स ने तालाब पाटकर कालोनियों को बसाया वह या तो सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोग थे या दबंग इस वजह से जनता भय से तालाबों पर काबिज होने वालों का भय से विरोध नहीं कर सकी। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि प्रशासन भी जानबूझकर भी अनजान बना हुआ था। इसी का नतीजा है कि तालाब देखने को नहीं मिलते हैं। शहर में करीब आठ एकड़ में कटोराताल था, जिन पर आज इसी नाम से मोहल्ला बसा दिया गया है। इस तालाब में जानवरों को नहलाया जाता था, धोबी ग्राहकों के कपड़ों की धुलाई कर परिवार का खर्च चलाते थे। कटोराताल में कालोनियां काट दिए जाने से धोबी अब करीब छह किलोमीटर दूर ढेला नदी में कपड़े धोने को मजबूर है। तालाब पाट दिए जाने से शहर में करीब में एक मीटर भूजल स्तर नीचे खिसक गया है। इससे कई हैंडपंप के जलस्रोत सूख गए हैं। जल निकासी की सुविधा न होने से थोड़ी सी बारिश होने पर जलभराव की समस्या हो जाती है। इससे घरों में गंदा पानी घुस जाता है। जनता को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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