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उत्तराखंड: नियुक्ति का खेला और भ्रष्टाचार,अब जीरो टालरेंस के आदेश का इंतज़ार 

@शब्द दूत ब्यूरो (27 अगस्त 2023)

देहरादून। आईएएस अरुणेंद्र सिंह चौहान पर आय से अधिक करीब 100 करोड़ की सम्पति अर्जित करने का आरोप है। आरटीआई एक्टिविस्ट सीमा भट्ट की शिकायत पर राष्ट्रपति और सीबीआई ने मुख्य सचिव उत्तराखंड उत्पल कुमार को अरुणेंद्र सिंह चौहान पर कार्रवाई के लिए पत्र भेजा था । ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री ने सख्त निर्देश दिए हैं कि जनता भ्रष्टाचार कि शिकायते सीधे आईएएस अधिकारियो को उनके मोबाइल पर भेजे ।

यहीं नही अरुणेंद्र सिंह चौहान द्वारा चिकित्सा शिक्षा,उत्तराखंड की पत्रावली में तत्कालीन सचिव नितेश झा एवं तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेद्र सिंह के लिखित आदेशों में हेराफेरी,जालसाजी,के गंभीर कृत्य कर 27.11.2018 को एक संदिग्ध ट्रांसफर ऑर्डर जारी किया गया जिसकी जांच जगदीश चंद्र तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (क्राइम) ने अपनी जांच 15.2.2020 के द्वारा की है परंतु पुलिस विभाग द्वारा उक्त अधिकारी के विरुद्ध कोई करवाही न कर शासन को अनुशंसा की गई की उक्त अरुणेंद्र सिंह के खिलाफ शासन स्तर पर कार्यवाही करने का निर्णय लिया जाए ।

इतने गंभीर आरोप होने पर भी शासन द्वारा संज्ञान न लेकर 10000 का वेतनमान ग्रेड दिया जाने पर अचंभित एवम आश्चर्यचकित करने वाले सवाल खड़े करता है कि अरुणेंद्र सिंह चौहान के सामने शासन के अधिकारी कितने बौने है।
और वर्तमान में भी सबसे कनिष्ठ होते हुए इनसे ऊपर वरिष्ठ तीन अधिकारी श्री लोहानी , कबिता नबियाल और अमिता जोशी के होते हुए इस भ्रष्ट अधिकारी को वर्तमान वित्त मंत्री द्वारा एवम शासन के उच्च अधिकारियों ने आंखे मूंद कर निदेशक वित्त बनाए जाने की संस्तुति कर दी। जैसे कि रमेश पोखरियाल के समय सबसे वरिष्ठ अजय जोशी,IAS को दरकिनार कर कनिष्ठ अधिकारी सुभाष कुमार को मुख्य सचिव बना दिया गया था और बाद में इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की निशंक को अन्य कई मामलों का संज्ञान लेते हुए गद्दी से हटाया गया था।

अरुणेंद्र सिंह चौहान पर ट्रेजरी के IFMS सिस्टम को अपने चहेते मित्र की कंपनी ” इंडस वेब सॉल्यूशन” को टेंडर के नियमों में भारी परिवर्तन करते हुए नियम विरुद्ध तरीके से सरकारी कार्यप्रणाली को दरकिनार करते हुए सरकारी भुगतान प्रणाली को निजी हाथो में सौप दिया गया जिससे उत्तराखंड के सरकारी खजाने को करोडो का नुकसान हो गया तथा इस विषयक जनहित याचिका माननीय उच्च न्यायलय उत्तराखंड नैनीताल 2019 से लंबित है जिस पर शासन स्तर से अभी तक कोई शपथ पत्र दाखिल नहीं किया गया है इस याचिका में अरुणेंद्र सिंह चौहान को याचिका कर्ता द्वारा पार्टी बनाया गया है ।

सुभारती विश्वविद्यालय के संचालक की पत्नी मुक्ति भटनागर ने एक चैनल को बताया था कि अरुणेंद्र सिंह चौहान एक विवादित आईएएस ओमप्रकाश के साथ इस कॉलेज में अपना अवैध पैसा लगा रहा है । आज तक इस कॉलेज का कोई निरिक्षण ही नहीं हुआ और शपथ पत्र के आधार पर ही चल रहा है। बकौल रिपोर्ट डा आशुतोष सायना इस संस्था के नाम एक बीघा भी भूखंड नहीं है फिर किसकी ट्रस्ट एवं जमीन पर रासबिहारी यूनिवर्सिटी और गौतम बुद्ध चिकित्सा ,महाविद्यालाय चल रहा है ? बड़ा सवाल क्योंकि इसकी भी जांच समिति में यही अफसर अरुणेंद्र सिंह चौहान मुखिया रहे थे। वो भी ईमानदार आईएएस के के मिश्रा को अपने से नीचे दबाकर। हद हो गयी जो कि ईमानदार आईएएस अधिकारी को तो सदस्य बनाया और जो विवादित था उसे जांच समिति का अध्यक्ष।

ज्ञात हो कि इस मामले में सरकार के इस विभाग के ही राजपत्रित अफसर द्वारा अरुणेंद्र सिंह चौहान की 100 करोड़ से अधिक संपत्ति के विवरण को सीबीआई को दिया गया था जिसकी खबर कई मीडिया हाउस ने प्रकाशित की थी।

72 करोड़ की निजी गारण्टी अरुणेंद्र सिंह चौहान ने निजी गारण्टी भी ली । गारंटी भी  2 सादे पन्नों पर। आखिर प्राइवेट संस्थान सुभारती की गारंटी लेने की क्या जरुरत थी ? जबकि प्रदेश के अनेक बड़े व्यवसायियों की देनदारी की आर सी कट जाती है।

तो क्या बाकि प्रदेश वासी क्या दुश्मन है ? ऐसा तो सचिवालय के इतिहास में पहली बार ही देखा है कि जिसने सरकार को 72 करोड़ रुपये आर सी कटने के बाद देना होना उस पार्टी से 2 सादे कागजों पर लिखवा कर ले लिया कि जब होंगे दे देंगे । यही नहीं इस बीच न कोई जमीन या सम्पत्ति बेचेंगे और न बंधक रखेंगे जबकि जमीन भी बंधक है और बेच भी रहे है।

सवाल यह है कि सरकार को 72 करोड़ का चूना लगाने में सुभारती मेडिकल कॉलेज वालों की मदद क्यों की  गई? आज 7 साल हो गए हाई कोर्ट में केस अर्जेन्सी एप्लीकेशन लगाकर जल्दी सुनवाई क्यों नहीं करवाई?

सुनने में आया कि सचिवालय में कार्यरत विधि विभाग में अधिकारी की पत्नी के माध्यम दबाब डलवाकर काम करवाया जाता है। मुख्यमंत्री धामी भ्रष्टाचार को लेकर जितने सख्त हैं अधिकारी उतने ही निरंकुश।

मंत्री धन सिंह रावत सुभारती पर एफआईआर और एडीएम को राज्य सरकार में निहित करने के आदेश देते है और अधिकारी के दबाव में जाकर आदेश रुकवा दिया जाता है क्यों?6 विभागों के मंत्री के आदेश रद्दी की टोकरी में डाल दिये गये।क्यूंकि आदेश  रुकवा दिया जाता है।

 

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