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बारिश तो अगले साल भी आएगी… आपदा में अवसर भी ढूंढ़ना है आखिर अवसर किसके लिए?एक ज्वलंत सवाल

@शब्द दूत ब्यूरो (27 अगस्त 2023)

बारिश तो अगले साल भी आएगी, लिहाजा अगले साल प्राकृतिक आपदाएं भी आएंगी। फिलहाल इस साल की आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया जा रहा है। तमाम सरकारी एजेंसियां सरकारी परिसंपत्तियों के नुकसान का आंकलन करने में जुटी हुई हैं। जरा बारिश का जोर रुक जाए तो केंद्र सरकार को नुकसान की रिपोर्ट भेजी जाएगी। मुख्यमंत्री दिल्ली जाएंगे और केंद्र से ज्यादा से ज्यादा रकम देने की मांग करेंगे। फिर खबरों में बताया जाएगा कि मुख्यमंत्री केंद्र से आपदा के नाम पर कितनी रकम ठग लाए। इस बीच, राज्य के आपदा पीड़ित आवाम को आस रहती है कि कुछ उसकी झोली में भी गिरेगा। लेकिन ये सिर्फ मुगालता है क्योंकि सरकार सिर्फ राजकीय संपत्ति के नुकसान का ही आंकलन करती है और केंद्र से भी उसी मद में रकम मिलती है।

ये तो रही सरकार की सरकारी बात। अब बात कर लेते हैं कि आखिर सूबे के आपदा पीड़ितों के हिस्से में क्या आता है। दरअसल, आपदा पीड़ितों के हिस्से में बतौर मुआवजा छोटी-मोटी रकम ही आती है। आपदा में संपत्ति के नुकसान का सरकारी आंकलन इतनी जटिल प्रक्रिया है कि अंत में पीड़ित को लगता है कि जान बच गई, वही काफी है। इसके अलावा आपदा में जान चली जाए तो सरकारें दो-चार लाख से ज्यादा मुआवजा नहीं देती। आपदा के दौरान पशुधन की हानि को भी सिद्ध करना एक टेढ़ी खीर ही होती है।

अब एक बार फिर वही बात कि बारिश तो अगले साल भी आएगी। जाहिर है कि आपदाएं भी दोबारा आएंगी। इसकी रोकथाम तो असंभव है लेकिन कुछ कदम उठाकर आपदा के प्रभावों को कम जरूर किया जा सकता है। मसलन, ऐसे स्थानों पर निर्माण न किए जाएं जहां पर कालांतर में पानी के स्त्रोत रहे हों। बरसाती नदियों और गधेरों के आसपास भूलकर भी भवन इत्यादि का निर्माण न करें।

केदारनाथ आपदा से भी हमने कुछ नहीं सीखा बल्कि वैज्ञानिकों की तमाम चेतावनियों के बावजूद धाम में भारी निर्माण कार्य आज भी जारी हैं। चारधाम परियोजना का हाल तो सबके सामने है ही। बाकी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल योजना की रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। बिना किसी वैज्ञानिक परीक्षण के बन रही इन दोनों परियोजनाओं के चलते समूचे उत्तराखंड में सैकड़ों छोटे-बड़े डंपिंग जोन बन गए है, जहां सभी नियम-क़ानूनों को धता बताते हुए मलबा सीधे नदी-नालों में डाला जा रहा है। ऐसी योजनाओं के विरोध को सरकारें विकास विरोधी ठहराती हैं, लेकिन वे नहीं बताती कि आखिर विकास किस कीमत पर और किसके लिए किया जा रहा है!

 

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