@शब्द दूत ब्यूरो (20 जून 2023)
काशीपुर। काशीपुर शहर में जनप्रतिनिधियों का एक दौर हुआ करता था। जब जनहित और जनसमस्या पर जनप्रतिनिधि अपने दबंग अंदाज में विकास कार्य कराया करते थे। यहां दबंग का आशय किसी तरह के खौफ से नहीं वरन जनप्रतिनिधि होने के फर्ज को जनता के हित के लिए अपनी शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया जाने से हैं।
ऐसे में बरबस ही याद आता है काशीपुर का एक रौबीला जनप्रतिनिधि जो अब हमारे बीच नहीं है। स्व सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया के रूप में ऐसा जनप्रतिनिधि मिला था जिसने अपने पद का उपयोग सिर्फ जनहित के लिए किया था। शहर की जनता के लिए सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया ने अपनी ही पार्टी के तत्कालीन वरिष्ठ नेताओं के माल्यार्पण और चापलूसी को सिर्फ इसलिए ताक पर रख दिया था कि शहर की समस्या का तुरत फुरत समाधान हो सके। हालांकि अब इसके विपरीत आज पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का स्वागत और माल्यार्पण तथा उनके महिमामंडन के आगे शहर की समस्याएं बौनी कर दी गई हैं। इसी माहौल के चलते आज काशीपुर की जनता समस्याओं से त्रस्त नजर आ रही है।
स्व सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया का तत्कालीन अधिकारियों पर इतना प्रभाव था कि उनकी चौखट पर जाकर अधिकारी पनाह मांगते थे। पनाह सिर्फ इसलिए कि अगर जनता की कोई समस्या है तो उसे कैसे हल कराया जाये? सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया की सोच अपने वरिष्ठ नेताओं के महिमामंडन से अलग हटकर थी । अपने जीवन काल में सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया कभी किसी अधिकारी से गुहार लगाने नहीं गये। ये अपने आप में उनका एक विशेष गुण था। एक छोटी सी गली में बना उनका कार्यालय शहर की जनसमस्या निवारण का केंद्र था। हालांकि आज जनसमस्या निवारण केंद्र की जगह स्वागत केंद्र बने हुए हैं कार्यालय। अगर कोई छोटी सी समस्या का निवारण भूले से हो जाता है तो उसका श्रेय लेने की होड़ मच जाती है।श्रेय लेने की इस होड़ के बीच जनता की वास्तविक समस्याएं कहीं गुम हो गई है।
नोट-शब्द दूत के पास शहर के कई लोगों के फोन आने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है। फोन करने वाले किसी राजनीतिक दल से नहीं वरन आम नागरिक थे।
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