@शब्द दूत ब्यूरो (27 फरवरी 2023)
काशीपुर। वर्षों पहले शहर में पर्वतीय लोगों की एक संस्था पर्वतीय समाज के नाम से जानी जाती थी। उसी दौर में एक अन्य संस्था गढ़वाल सभा भी बनी हुई थी। गढ़वाल सभा आज भी अस्तित्व में है लेकिन पर्वतीय समाज नाम की संस्था को देवभूमि पर्वतीय महासभा में विलय कर दिया गया।
देवभूमि पर्वतीय महासभा के गठन का उद्देश्य शहर के कुमाऊं और गढ़वाल के लोगों की संयुक्त संस्था बनाना था। पर आज पर्वतीय समाज संस्था का अस्तित्व समाप्त हो गया जबकि गढ़वाल सभा आज भी कायम है। देवभूमि पर्वतीय महासभा में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों के सदस्य और पदाधिकारी बनते आये है। यहां तक कि पर्वतीय समाज का भवन भी इसी देवभूमि पर्वतीय महासभा के अधिकार में है। पर्वतीय समाज की सभी संपत्ति देवभूमि पर्वतीय महासभा की कही जाती है। यहां बता दें कि काशीपुर में पर्वतीय रामलीला के लिए देवभूमि नाट्य मंच भी बनाया गया। जिसके द्वारा काफी समय तक रामलीला का मंचन कराया गया। अब वह संस्था भी अस्तित्व में नहीं है। रामलीला का आयोजन देवभूमि पर्वतीय महासभा द्वारा कराया जाने लगा।
दरअसल पर्वतीय समाज को देवभूमि पर्वतीय महासभा में विलय करने के बाद एक अच्छी पहल ज़रूर की गई लेकिन धीरे धीरे देवभूमि पर्वतीय महासभा ने पर्वतीय समाज के संस्थापकों को दरकिनार करना शुरू कर दिया।आज पर्वतीय समाज के संस्थापकों के परिजन अपने आपको आहत महसूस करने लगे हैं। उनके पूर्वजों ने जिस संस्था के गठन और भवन निर्माण के लिए कवायद की उन्हें बिसरा दिया गया है जिससे देवभूमि पर्वतीय महासभा के प्रति उनके मन में कोई खास लगाव नहीं है।
ये घोर बिडम्बना है कि जिन लोगों ने पर्वतीय समाज की स्थापना में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनके परिजन आज देवभूमि पर्वतीय महासभा के सदस्य तक नहीं है। देवभूमि पर्वतीय महासभा के सदस्यों की संख्या की अगर बात की जाये तो इसकी संख्या सैकड़ों में है। जबकि काशीपुर में 25 से 30 हजार या उससे भी अधिक लोग पर्वतीय मूल से हैं। ऐसे में हजारों लोगों की सदस्यता का दावा करने वाली देवभूमि पर्वतीय महासभा चंद लोगों का जेबी संगठन बनकर रह गया है। कुछ ऐसे लोग देवभूमि पर्वतीय महासभा के पदाधिकारी हैं जो सदस्य तक नहीं है।
पिछले कुछ समय से देवभूमि पर्वतीय महासभा का जो विवाद चल रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। यहां खास बात यह है कि महासभा की बैठकों और कार्यक्रमो में कुछ चेहरे जो मंच पर बैठा करते हैं वह इस विवाद को सुलझाने के बजाए ड्रामा देखने में मशगूल हैं। हालांकि विवाद सुलझने के बाद फिर यही चेहरे मंच पर नजर आयेंगे। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि सम्मान पाने की चाहत रखने वाले ये चेहरे पर्वतीय महासभा नामक संस्था के इस बुरे दौर में खुद को किनारे रखकर नेतृत्व की चाह रखते हैं।
शहर के हजारों पर्वतीय मूल के लोगों को देवभूमि पर्वतीय महासभा के इस दौर से निराशा हाथ लगी है।जो संस्था पर्वतीय मूल के लोगों की समस्यायों, पर्वतीय संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाई गई थी वह आज विवादों में घिरी हुई है। दुःख की बात यह है कि ये विवाद महासभा के पदाधिकारियों की देन है।
शब्द दूत की पर्वतीय समाज के लोगों से जो बातचीत हुई है उसका लब्बोलुआब यह है कि इस संस्था के प्रति उनका मोह भंग हो रहा है।
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