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ईरान में पर्दे के खिलाफ घमासान@मुस्लिम महिलाओं की जागृति पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की बेबाक कलम से

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

कल का फारस यानि आज का ईरान जल रहा है.ईरान में आग उन महिलाओं के विद्रोह से भड़की है जो पर्दा प्रथा यानि हिजाब का विरोध कर रहीं हैं. पर्दे से आजादी पाने के लिए ईरान की कम से कम 40 महिलायें अब तक अपनी शहादत दे चुकीं है,और ये सिलसिला कहाँ जाकर थमेगा कहा नहीं जा सकता .शिया बहुल इस इस्लामिक देश में हिजाब के खिलाफ इस जंग ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा है .

ईरान में ईरान एक इस्लामिक देश है, जो शरिया कानून पर चलता है. ईरान में सात साल से ज्यादा की किसी भी लड़की को अपने बालों को कवर करने के बाद ही बाहर निकलने की अनुमति है. साथ ही इसी उम्र के बाद से लड़कियों को लंबे और ढीले कपड़े पहनने के लिए कहा जाता है. बीते पांच जुलाई को भी ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने हिजाब कानून लागू किया था, जो एक तरह की नई पाबंदी महिला और लड़कियों पर ईरान में लगाई गई है. अगर कोई इन नियमों को तोड़ता है तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है. नियम तोड़ने वाले पर कई बार जुर्माना तो कई बार गिरफ्तारी भी कर ली जाती है.

ईरान के पुरुषवादी समाज की इन पाबंदियों के खिलाफ मुल्क की बन्दियाँ जब सड़कों पर उतरीं तो पूरा ईरान जल उठा.मुल्क के कोई 50 से ज्यादा शहरों में औरतों ने इन पाबंदियों के खिलाफ सड़कों पर सत्याग्रह किया,हिजाब की होली जलाई और अपने केश भी कटवाए .इस विद्रोह को दबाने के लिए ईरान ी सरकार ने बल प्रयोग किया और इसी के चलते 40 महिलाएं अब तक शहीद हो चुकी हैं .ईरान इन महिलाओं को शहीद नहीं मानता, लेकिन दुनिया मानती है .
ईरान के ताजा घटनाक्रम का भारत से सीधा रिश्ता है.हमारे यहां भी हिजाब को लेकर महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रहीं हैं. सड़कों पर भी इसका विरोध हुआ,लेकिन ये लड़ाई ईरान की लड़ाई से अलग है. यहां हिजाब के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं कम हिन्दू युवक ज्यादा सक्रिय हैं .जबकि ये मामला महिलाओं का है.वे हिजाब अपनाएँ या उतार फेंकें .भारत में हिजाब केवल मुस्लिम महिलाओं में ही नहीं बल्कि हिन्दुओं और दूसरे समाजों में भी घूंघट प्रथा के रूप में है. .भारत में मुगलों के आने से पहले शायद महिलाएं घूंघट में नहीं रहतीं थीं. लेकिन ये प्रथा आज भी देश के तमाम दूर-दर्ज के हिस्सों में प्रचलित है.

ईरान की इस्लामिक सरकार महिलाओं की भावनाओं को समझने और माने को राजी नहीं है. उसके लिए शायद इंसानियत से ज्यादा मजबह ज्यादा जरूरी है .उग्र होते प्रदर्शनों को देखते हुए सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगा दी है. इसके साथ ही ईरान के खुफिया मंत्रालय ने गुरुवार को चेतावनी दी कि विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना अवैध है और प्रदर्शनकारियों पर केस चलाया जाएगा.

महिसा अमिनी नाम की एक युवती इस हिजाब विरोधी आंदोलन के दौरान पुलिस हिरासत में जान देने वाली पहली महिला है. महसा अमिनी को पुलिस ने महिलाओं के लिए ईरान के सख्त ड्रेस कोड के उल्लंघन के मामले में गिरफ्तार किया था.महिसा की मौत ने इस आंदोलन में आग में घी डालने का काम किया है .महिसा एक पत्रकार और सामजिक कार्यकर्ता थी .अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देश ईरान की महिलाओं के साथ खड़े हैं लेकिन भारत मौन है. भारत के मौन के मायने आपको बताने की जरूरत नहीं है ,क्योंकि ये मौन सीधा सियासत से जा जुड़ता है.

कहने को ईरान हमारे उत्तर प्रदेश की आबादी से भी छोटा मुल्क है लेकिन इसका एक समृद्ध और पुराना इतिहास है .इस इतिहास की बिना पर ईरान डगमगाता दिखाई दे रहा है. ईरान की महिलाएं आजादी चाहतीं हैं ,वे पिंजरे में बंद पालतू परिंदों की तरह नहीं रहना चाहतीं.मुझे लगता है की ईरानी महिलाओं का ये आंदोलन आज नहीं तो कल रंग लाएगा. क्योंकि दुनिया में कोई भी शहादत बेकार नहीं जाती .किसी भी आंदोलन को केवल सत्ता की ताकत से समाप्त नहीं किया जा सकता .भारत के पास तो आंदोलनों का लंबा इतिहास है .पिछले साल ही हमारे देश के किसानों ने सत्याग्रह के मार्ग पर चलकर 700 कुर्बानियां दी थीं और अंतत: सरकार को झुकना पड़ा था .

महिलाओं पर हिजाब थोपने वाला ईरान दुनिया का अकेला देश नहीं है .अफगानिस्तान में तालिबान के तहत पर्दा सख्ती से किया जाता था, जहां महिलाओं को सार्वजनिक रूप से हर समय पूर्ण पर्दा का पालन करना पड़ता था। केवल करीबी पुरुष परिवार के सदस्यों और अन्य महिलाओं को उन्हें पर्दे से बाहर देखने की अनुमति थी। अन्य समाजों में, पर्दा अक्सर केवल धार्मिक महत्व के निश्चित समय के दौरान ही प्रचलित होता है। अफगानिस्तान में भी इस प्रथा के खिलाफ मलाला जैसी लड़कियों ने परचम उठाया था .

भारत के कुछ हिस्सों में विवाहित हिंदू महिलाएं पर्दा का पालन करती हैं, कुछ महिलाएं अपने पति की ओर से बड़े पुरुष संबंधों की उपस्थिति में घूंघट पहनती है। कुछ मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहनकर पर्दा करती हैं। दुपट्टा मुस्लिम और हिंदू दोनों महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला घूंघट होता है, जो अक्सर धार्मिक घर में प्रवेश करते समय होता है।

हिजाब यानि पर्दा आमतौर पर इस्लाम के साथ जुड़ा हुआ है, इसे लेकर विद्वान खूब तर्क-वितर्क करते हैं कि महिलाओं को पर्दा करना और एकांत में रहना इस्लाम से पहले का है. ये प्रथाएं आमतौर पर मध्य पूर्व में विभिन्न समूहों जैसे ड्रूज़, ईसाई और यहूदी समुदायों में भी पाई जाती थीं। कहा जाता है कि बुर्का इस्लाम से पहले अरब में मौजूद था, और उच्च वर्ग की महिलाओं की गतिशीलता बेबीलोनिया, फ़ारसी में प्रतिबंधित थी। इतिहासकारों का मानना ​​है कि 7वीं शताब्दी ई. में अरब साम्राज्य के आधुनिक इराक में विस्तार के दौरान मुसलमानों द्वारा पर्दा का अधिग्रहण किया गया था और इस्लाम ने उस समय की पहले से मौजूद स्थानीय प्रथाओं में केवल धार्मिक महत्व जोड़ा।

बहरहाल ईरान जल रहा है. हिजाब को लेकर भारत में भी यत्र-तत्र धुआं उठता ही रहता है .जलता ईरान अपने आपको इस आग से बचा पायेगा या नहीं,अभी कहना कठिन है ,लेकिन वहां जो हो रहा है वो इस बात का संकेत अवश्य कर रहा है कि अब दुनिया की औरतें अपने वजूद के लिए कुछ भी कर गुजरने का मन बना चुकी हैं. उन्हें सत्ता हो मजहब कोई आगे बढ़ने से रोक नहीं सकता .
@ राकेश अचल

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