@शब्द दूत ब्यूरो (06 सितंबर, 2022)
जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय के मिजाज को बिगाड़ रहा है। साल दर साल आने वाली अप्रत्याशित आपदाएं डरा रही हैं। बीते कुछ सालों की घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि कैसे बेमौसम की बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण हिमालयी क्षेत्र को बड़ी त्रासदी से गुजरना पड़ा है।
बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों में गर्मी, गर्मियों में तेज बारिश और मानसून बीतने के बाद आई आपदा ने राज्य के लाखों लोगों को प्रभावित किया। सैंकड़ों गांव विस्थापन की मांग कर रहे हैं। बेमौसमी बारिश और आपदा से राज्य को करोड़ों का नुकसान हुआ है। बागवान से लेकर किसान तक इससे प्रभावित हुए हैं।
वर्ष 2013 में 16 और 17 जून को आई आपदा ने केदारनाथ घाटी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। उच्च हिमालय क्षेत्र में आई अप्रत्याशित बाढ़ ने केदारनाथ समेत राज्य के पर्वतीय जिलों में जो तांडव मचाया था, उसे याद करते हुए आज भी आत्मा कांप जाती है। इस जलप्रलय में आधिकारिक रूप से चार हजार से अधिक लोगों की जान गई। केदारनाथ धाम और इसके आसपास के इलाकों में इस कदर तबाही आई थी कि इससे उबरने में समय तो लगा ही, साथ ही पुनर्निर्माण में करीब 2700 करोड़ रुपये भी खर्च हो गए।
केदारनाथ आपदा की बात करें तो इस आपदा में 4400 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए। आपदा के चलते 4200 से अधिक गांवों का पूरी तरह से संपर्क टूट गया था। जलप्रलय में 1309 हेक्टेयर कृषि भूमि बह गई और 2141 भवन पूरी तरह से नष्ट हो गए। सेना व अर्द्ध सैनिक बलों ने 90 हजार लोगों को रेस्क्यू किया जबकि 30 हजार लोगों को पुलिस ने बचाया। 30 हजार से अधिक स्थानीय लोगों को पुलिस ने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था।
वर्ष 2021 में फरवरी माह में रैणी आपदा भी एक अप्रत्याशित घटना थी। जल प्रलय में 206 लापता हो गए थे, इनमें से अब तक 176 के शव बरामद हो चुके हैं। जबकि 50 से अधिक लोग लापता हैं। इस आपदा से 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड़ जल विद्युत परियोजना पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। चमोली आपदा के बाद तमाम विज्ञानियों ने यह भी बताया कि ऋषिगंगा कैचमेंट से निकली जलप्रलय महज एक घटना नहीं, बल्कि इसमें कई घटनाक्रम शामिल थीं। वाडिया संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, करीब 5600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रौंथी पर्वत से जब हिमखंड टूटा तो नीचे रौंथी गदेरे (ऊंचाई समुद्र तल से 3800 मीटर) तक पहुंचते हुए मलबे का वेग 55 मीटर प्रति सेकेंड था। इसके बाद प्राकृतिक आपदाओं के लिए सर्वाधिक संवेदनशील उत्तराखंड राज्य में एक राज्य आपदा प्रबंधन संस्थान खोले जाने की सिफारिश की गई थी।
बीते वर्ष जनवरी के महीने में उत्तराखंड के जंगलों में जगह-जगह आग लगने की घटनाएं सामने आईं। एक अक्तूबर 2020 से चार जनवरी 2021 तक राज्य के जंगलों में आग की 236 घटनाएं हुईं। इसकी वजह अक्तूबर से दिसंबर 2020 तक सामान्य बारिश में 71 प्रतिशत कमी बताई गई। इसके अलावा बीते वर्ष मई महीने की शुरुआत ही राज्य में एक के बाद एक बादल फटने की घटनाओं से हुई। तकरीबन 24 से अधिक बादल फटने की घटनाएं विभिन्न सूचना माध्यम के जरिए रिपोर्ट की गईं।
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