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उत्तराखंड का पांडव सेरा: जहां आज भी अपने आप उगती है पांडवों की उगाई धान

@शब्द दूत ब्यूरो (15 जुलाई, 2022)

रुद्रप्रयाग के मदमहेश्वर-पांडव सेरा-नन्दीकुंड मार्ग से 25 किलोमीटर पैदल मार्ग पर स्थित पांडव सेरा में आज भी पांडवों के अस्त्र शस्त्र पूजे जाते हैं, जबकि द्वापर युग में पांडवों की ओर से रोपित धान की फसल आज भी अपने आप उगती है। यहां पांडवों द्वारा निर्मित सिंचाई गूल आज भी पांडवों के हिमालय आगमन के साक्ष्य है।

पांडवसेरा के इस मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार केदारनाथ धाम में पांचों पांडवों को भगवान शंकर के बैल रूपी पृष्ठ भाग के दर्शन हुए। पांचों पांडव यहीं से द्रौपदी सहित मदमहेश्वर धाम होते हुए मोक्षधाम बदरीनाथ गए।

मदमहेश्वर धाम में पांचों पांडवों के अपने पूर्वजों के तर्पण करने के साक्ष्य आज भी एक शिला पर मौजूद हैं। मदमहेश्वर धाम से बद्रीकाश्रम जाते वक्त पांचों पांडवों ने कुछ समय यहां व्यतीत किया तो यह स्थान पांडव सेरा के नाम से विख्यात हुआ। पांडव सेरा में आज भी पांडवों के अस्त्र-शस्त्र पूजे जाते हैं तथा पांडवों द्वारा सिंचित धान की फसल आज भी अपने आप उगती है और पकने के बाद धरती के आंचल में समा जाती है।

मान्यता यह भी है कि पांडव सेरा से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित नन्दीकुण्ड में स्नान करने वाले मनुष्य का अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।

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