@शब्द दूत ब्यूरो (25 जून 2022)
गाय को गौमाता का सिर्फ दर्जा मिला हुआ है। शहर में कूड़े के ढेरों पर मुंह मारती गायों को देखकर तो ऐसा ही लगता है।
काशीपुर में तमाम जगह पर बजबजाती गंदगी समेटे कूड़े के ढेरों पर आपको कई गायें दिख जायेंगी। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कूड़े के ढेर पर आपको भैंस शायद ही कहीं मिले। गाय जो पवित्र पशु माना जाता है उसे पालने वाले सिर्फ दूध बेचने के मंतव्य से पालते हैं।
आवारा घूमती गाये कूड़े में मुंह मारती नजर आती है। गोवंश सड़कों पर भटक रहे हैं। खाने को चारा तो दूर पीने को पानी तक नसीब नहीं होता। भूख प्यास सहन नहीं होती तो गोवंश कूड़े ढेर से कूड़ा व पॉलीथिन खाकर पेट की आग शांत करता है। यहीं पॉलीथिन आंतड़ियों में फंसकर गोवंश को तड़प-तड़पकर मरने के लिए मजबूर कर देता है। इन्हें बचाने न तो कोई गोरक्षक आता है और न ही गोसेवक। बहुत सी गाय तड़प-तड़प कर दम तोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं। नगर निगम के सफाई कर्मचारी जब तक कूड़ा नहीं उठाते तब तक सड़कों पर कूड़े का ढेर, डस्टबिन आदि पूरी तरह कूड़े से भर जा रहे हैं। देर से कूड़ा न उठने पर सड़कों पर बिखर जाता है।
शहर में कूड़े के ढेर पर आवारा गायों के संबंध में नगर निगम के एम एन ए विवेक राय कहते हैं कि यह पशु चिकित्सा विभाग को देखना है। अलबत्ता गौ पालकों द्वारा शहर की नालियों में गोबर बहाने को लेकर नगर निगम खासा गंभीर है। उन्होंने बताया कि लगभग 18 मामले दर्ज हैं जिन पर केस चल रहा है।
उधर पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ मुकेश दुमका का कहना है कि आवारा घूम रही गायों के लिए नगर निगम को कार्रवाई करनी चाहिए। कूड़े के ढेर पर गाय के द्वारा जो पॉलीथिन की पन्नियां खा ली जाती है। वह काफी नुकसानदायक हो सकता है। डॉ दुमका कहते हैं कि ज्यादा मात्रा में अगर पॉलिथिन गाय के पेट में पहुंच जाता है तो उसका पेट चोक हो सकता है और इसके परिणामस्वरूप गाय की मृत्यु तक हो सकती है।
बहरहाल शहर में गौपालकों द्वारा जिस तरह से गाय पर लगातार अत्याचार किया जाता है उससे गाय को गौमाता का दर्जा देने की बात केवल किताबी और भाषणों तक सीमित है। गौपालकों द्वारा गाय के बूढ़े होने पर उसे चारा खिलाने के खर्च से बचने के लिए शहर में छोड़ दिया जाता है।
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