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उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जमीनों की खरीद फरोख्त में बड़ा फर्जीवाड़ा

बड़े बड़े नामी लोगो को वो जमीन कैसे मिली? और कैसे उनके एवं उनकी कंपनी के नाम या संस्था के नाम करवाई गई ।

@मनीष वर्मा

देहरादून (19 मई 2022 । देहरादून के झाजरा गांव में सरकारी जमीन, टोंस नदी की जमीन,बंजर जमीन और गोल्डन फॉरेस्ट की जमीनों में बड़ा घोटाला,फर्जीवाड़ा और अदला बदली का खेल हुआ है । यहां तक अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियो को तथा अनुसूचित जाति के लोगो के नाम जमीन खरीदकर अथवा जमीन की जिलाधिकारी के यहां से अनुमति लेने के बाद शेष बची जमीन ( जिसपर शेष भूमि दिखाकर अनुमति ली गई ) उसको भी बाद में बेच दिया गया ।

यदि सरकारी जांच इस क्षेत्र के पटवारी,तहसीलदार के अलावा किसी अन्य जांच एजेंसी या उच्च स्तर पर करवाई जाए तो बड़े बड़े खुलासे होंगे कि कैसे गरीब लोगो के पट्टे किस प्रकार हजम किए गए। और गरीबों को तो नदी,बंजर और ग्राम समाज या उत्तराखंड सरकार की जमीन आवंटित हुई नही। बड़े बड़े नामी लोगो को वो जमीन कैसे मिली? और कैसे उनके एवं उनकी कंपनी के नाम या संस्था के नाम करवाई गई ।

सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा खरीद बिक्री गोल्डन फॉरेस्ट से जुड़े 3 व्यक्तियों द्वारा ऑरिजिनेट की गई है और कागजों को मैनुपेलेट किया गया है। और आपस में एक दूसरे को खड़ा करके न्यायालय तहसीलदार विकासनगर,एसडीएम विकासनगर को गुमराह कर आदेश लिए गए है । ऐसा नहीं है कि अपर आयुक्त कोर्ट में कुछ मामले न गए हो और कोर्ट ने उनको स्टे या रोक न लगाई हो परंतु कई ऐसे मामले जो प्रकाश में ही नही आए उन पर पड़ताल जारी है और जल्दी ही चौंकाने वाले खुलासे किए जाएंगे ।

ज्ञात हो कि कुछ वर्ष पहले झाजरा क्षेत्र में ही रिकॉर्ड पर व्हाइट फ्लूड लगाकर हेरा फेरी करने और रिकॉर्ड फाड़ने और गायब करने का मामला मीडिया की जबरदात सुर्खिया बना था पर किन लोगो ने वो खेल खेला था आज तक दबा हुआ है

काफी बड़ा मामला इस क्षेत्र से जुड़े गौतम बुद्ध सुभारती मेडिकल कॉलेज सहित आस पास की जमीनों का है। जिसमे माननीय उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव को बड़े स्तर के अधिकारियों से जांच करवाने हेतु पिछले सप्ताह आदेश जारी किए है ।

ऐसा नहीं कि कई मामलों में FIR और SIT जांच भी प्रचलित हुई है। जो अभी तक लंबित है और हाई कोर्ट से अपराधी जमानत पर भी छूटे हुए है और केस न्यायालय के चल रहा है। जिसमे नामी गिरामी लोगो के नाम भी शामिल है जो अंडे बेचने की दुकान से लेकर अपनी यूनिवर्सिटी तक बना चुके है। जबकि यूनिवर्सिटी बनाने के मानकों में प्रस्ताव एवम संस्था पर क्रिमिनल केस नही होना चाहिए और इसमें और सुभारती में मामले में इस् तथ्य सहित अन्य कई तथ्यो की अनदेखी की गई और आज भी यही लोग इस तरह के कई अन्य खेल में शामिल है ।

एक उदाहरण प्रमाण सहित :

वहीं कई अन्य ऐसे मामले भी ही जिनमे एक बार बिकी हुई जमीन को न्यायालय के स्टे के बावजूद भी इन्ही लोगो द्वारा दुबारा खरीद लिया गया और बड़ा हेर फेर किया गया जिसका सम्पूर्ण खुलासा जल्दी ही किया जायेगा ।

सुभारती मामले में बड़े खुलासे एवं रिपोर्ट माननीय उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित मुख्य सचिव द्वारा गठित उच्च स्तरीय कमेटी के समक्ष प्रतुत किए जायेंगे । जिसके बाद पिछली बार की तरह यह कॉलेज बंद होना तय है क्योंकि पिछली बार भी माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इसको सील किया किया गया था तथा 300 एमबीबीएस के छात्रों को राज्य सरकार द्वारा राज्य के ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों में शिफ्ट किया गया था। इस मामले में 97 करोड़ रुपए की पेनाल्टी सुभारती पर लगाई थी जो आज भी सुभारती वालो ने बचे हुए 72 करोड़ के रूप में देनी है। इसकी वसूली तो छोड़ तत्कालीन सचिव पंकज पांडे द्वारा पुनः इतना फर्जीवाड़ा होते हुए भी एमबीबीएस खोलने हेतु निदेशालय की न खोलने देने की संस्तुति को दर किनार करते हुए प्रमाण पत्र जारी किया गया। जिसपर अब माननीय उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव को आदेश जारी किए है। जबकि राज्य सरकार केंद्र के बैसाखी पर है और कई विभागों में तनख्वा देने के पैसे सरकार के पास नही है ।

तरसेम तो एक मोहरा है ऐसे की कई मोहरों के नाम जल्दी ही कमेटी को बताए जाएंगे।

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