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उत्तराखंड: तराई से लेकर पहाड़ तक सुरक्षा के साथ संप्रभुता के लिए भी चुनौती बने रोहिंग्या

@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो (22 अप्रैल, 2022)

बांग्लादेश के रास्ते भारत में दाखिल हुए रोहिंग्या समुदाय ने नेपाल के बाद पहाड़ को सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। दलालों के माध्यम से ये हल्द्वानी व ऊधम सिंह नगर के रास्ते उत्तराखंड के पूरे कुमाऊं मंडल में पहुंच गए हैं। स्थानीय विशेष समुदाय में घुल-मिल धीरे-धीरे अब ये सुरक्षा के साथ ही संप्रभुता के लिए भी चुनौती बन गए हैं।

सबसे बड़ी बात ये है कि पहाड़ लगातार खाली होते जा रहे हैं। पहाड़ के निवासियों का राज्य के भीतर पलायन या अन्य राज्यों की ओर चले जाना भी खतरे की घंटी बजा रहा है। फिलहाल स्थिति ये है कि उत्तराखंड के सीमांत इलाके खाली होते जा रहे हैं और इन घुसपैठियों के लिए आसानी पैदा कर रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो इनका पहाड़ तक पहुंचने का रूट बड़े खतरे की तरफ संकेत कर रहा है। मसलन, इनके लिए बांग्लादेश से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड तक विशेष कारिडोर तैयार किया गया है। इसमें उत्तराखंड से सटे उत्तर प्रदेश के कई जिले भी अतिसंवेदनशील श्रेणी में हैं। जहां से उन्हें बड़ी मदद मिल रही है।

कुमाऊं मंडल के ऊधम सिंह नगर, नैनीताल, पिथौरागढ़, चम्पावत जिले घुसपैठ की दृष्टि से अति संवेदनशील माने जा रहे हैं। भौगोलिक दृष्टि से इन जिलों को रोहिंग्या समुदाय की घुसपैठ और घुलने मिलने के लिए आदर्श माना जा रहा है। यह भी माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस तरह की घुसपैठ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा सिरदर्द बनने वाली है।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बांग्लादेश से होते हुए भारत में दाखिल होने के बाद रोहिंग्या का पहला पड़ाव वाराणसी होता है। यहां से कुछ गोरखपुर की तरफ निकलते हैं जो सोनौली होते हुए नेपाल तक पहुंचते हैं। बाकी लखनऊ की तरफ बढ़ते हैं। यहां से भी एक हिस्सा कानपुर का रुख करता है जो बाद में गाजियाबाद, गुरुग्राम और दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में बंट जाता है।

वहीं, लखनऊ से शाहजहांपुर, फरदीपुर के रास्ते इनका दल बरेली पहुंचता है। यहां से धीरे-धीरे उत्तराखंड के हल्द्वानी व ऊधम सिंह नगर के रास्ते नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चम्पावत व पिथौरागढ़ तक पहुंच जाते हैं। 2012 के बाद इनकी लगातार बढ़ती संख्या सुरक्षा के साथ ही सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से भी गंभीर संकट उत्पन्न कर रही है।

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