@शब्द दूत ब्यूरो (10 अप्रैल 2022)
काशीपुर। पूर्व सांसद सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के पिता किशोरी लाल गुड़िया एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे । उनके परिवार ने 1945 में काशीपुर में जो गुड़िया प्रेस लगाई उसका भी जंगे आजादी में अपना अलग ही एक रूतबा रहा । आजादी के आंदोलन में इस प्रेस पर अंग्रेजों के विरुद्ध पम्पलेट छपते थे और जनता में बांटे जाते थे।
अंग्रेजों ने इस प्रेस पर कई बार छापा मारा मगर कुछ नहीं मिला। सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के पिता किशोरी लाल गुड़िया के परिवार की आर्थिक स्थिति उस समय भले ही काफी कमजोर क्यों न रही हो मगर उनके परिवार ने देश प्रेम में अपने कारोबार को भी दांव पर लगा दिया था और 1945 व 1947 के बीच यह प्रेस तीन बार अंग्रेजों ने सील कर दी। लेकिन आश्चर्यजनक बात यह थी कि बाहर भले ही ताला अंग्रेजी लगा होता था और अंदर वंदे मातरम की कहानी लिखी जाया करती थी।
इस प्रेस में वाशिंगटन में निर्मित हैंड मशीन लगी हुई थी जिस पर पूरे दिन में मात्र 1000 कागज छपते थे। बाद में 1952 में जर्मनी निर्मित ट्रेडिल मशीन आ गई। 1954 में बिजली आने पर इस मशीन को बिजली से चालू कर दिया गया और 1964 में अमृतसर की ट्रेडिंल मशीन लगी। 1958 में इस प्रेस की जिम्मेदारी अकबर हुसैन अंसारी ने संभाली।
अंग्रेजी जमाने में जिस गुड़िया प्रेस ने खाकी वर्दी का खौफ देखा। उसी गुड़िया प्रेस ने सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के राजनीति में आने के बाद वह दौर भी देखा जब खाकी पहनकर आने वाले बड़े से बड़े अफसर इस प्रेस में स्टूल पर बैठ कर श्री गुड़िया को सलाम मारने का इंतजार किया करते थे। लोगों में एक उत्सुकता देखी जाती रही है कि आखिर गुड़िया परिवार काशीपुर का ही है या फिर बाहर से आया ।
बताया जाता है कि श्री गुड़िया का परिवार हरियाणा से आकर काशीपुर में बसा। इस परिवार का मुरादाबाद के पास के क्षेत्र से भी करीबी रिश्ता रहा है। सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के बड़े भाई नरेंद्र गुड़िया बताते थे कि उनका परिवार हरियाणा से आकर काशीपुर में बसा था। उनके बाबा कल्याण चंद्र यहां आए थे और वे देसी दवाई बना कर देते थे। दवाइयों में गुड़ का प्रयोग होता था इसलिए इनके यहां काफी मात्रा में गुड़ खरीद कर रखा जाता था। उस गुड़ के कारण ही हमारा परिवार गुड़ से गुड़िया हो गया।
चूंकि परिवार काफी पहले यहां आ गया था इसलिए यहां जन्मे गुड़िया परिवार के लोगो को यह ज्ञात नहीं कि हरियाणा में इनका गांव कौन सा था? नरेंद्र गुड़िया ने बताया था कि एक बार हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक कार्यक्रम में काशीपुर आए थे और उन्होंने श्री गुड़िया को उनके पैतृक गांव का नाम बताया था मगर मैं श्री गुड़िया से गांव का नाम नहीं पूछ सका और उसके बाद सत्येंद्र चंद्र गुड़िया का निधन हो गया। नरेंद्र गुड़िया ने बताया कि हम हरितस्य गोत्र के हैं ।
इस परिवार के यहां आकर बसने का एक बड़ा कारण यह है कि इनकी अधिकांश रिश्तेदारियां यहां थी । सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के पिता किशोरी लाल जी का जन्म सन उन्नीस सौ में हुआ ।सन 1922 में इनका विवाह हुआ और शादी के कुछ ही दिन बाद देश के प्रति असीम प्रेम एवं गुलाम पड़े देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने हेतु किशोरीलाल गुड़िया स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
कहा तो यहां तक जाता है कि काशीपुर में उन्होंने ही स्वतंत्रता आंदोलन की अग्नि को और बढ़ाया था। 9 लोगों के जत्थे के साथ मुरादाबाद जेल में 6 माह का कारावास भोगा । इस दौरान गुड़िया परिवार आर्थिक रूप से भी काफी कमजोर हो गया था । घर का समस्त व्यापार और संपत्ति खत्म हो गई ,इसके बावजूद किशोरीलाल गुड़िया पीछे नहीं हटे। जेल से वापसी के पश्चात आप तत्कालीन जिला नैनीताल के कांग्रेस कमेटी के मंत्री नियुक्त हुए ।आपने अपने कार्यकाल में कुमाऊं मंडल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का एक विशाल अधिवेशन काशीपुर में आयोजित किया जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू भी आप के आमंत्रण पर शामिल हुए थे ।आप 1942 में फिर जेल गए । स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ आपने अन्य राजनीतिक एवं सामाजिक कर्तव्यों का भी निर्वाह किया ।आप 1942 में नगर पालिका काशीपुर के सभासद भी निर्वाचित हुए और उदय राज हिंदू इंटर कॉलेज प्रबंध समिति के सदस्य भी रहे ।
गुड़िया परिवार वैसे तो आर्य समाजी रहा मगर सभी धर्मों का इस परिवार ने हमेशा सम्मान और आदर किया। हिंदी प्रेम सभा ब्राह्मण सभा सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों में आप ने मुख्य भूमिका निभाई। 31 जुलाई 1973 की प्रातः 9बजे नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल में किशोरी लाल गुड़िया का निधन हो गया।
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