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काशीपुर फ्लैश बैक :सत्येंद्र चंद्र गुड़िया के रुतबे का कमाल,एसडीएम का तबादला, दारोगा को लौटानी पड़ी रिश्वत, मंत्री के सामने निर्माण कार्यों में अनियमितता पर सीएमओ को पिलाई झाड़, जनता को समर्पित व्यक्तित्व

काशीपुर के विरले राजनेता सत्येंद्र चंद्र गुड़िया की इसी माह 24 अप्रैल को पुण्य तिथि है शब्द दूत इस राजनेता के व्यक्तित्व व कृतित्व पर एक श्रृंखला प्रकाशित कर रहा है। जानिये उनके राजनीतिक कौशल की बातें।

@शब्द दूत ब्यूरो (06 अप्रैल 2022)

काशीपुर। राजनीतिक ताकत तो बहुतेरों को मिलती है मगर सवाल यह है कि कौन उस ताकत का सदुपयोग करता है ?और कौन दुरुपयोग ? कुछ नेता ऐसे होते हैं जिन्हें ताकत मिलने से न सिर्फ जनता बल्कि प्रशासनिक मशीनरी भी खुश होती है जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें ताकत मिलने पर न जनता खुश होती और न प्रशासनिक मशीनरी। लेकिन इसका अपवाद रहे सत्येंद्र चंद्र गुड़िया एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपनी ताकत का कभी दुरुपयोग नहीं किया। यही कारण है कि उनसे न जनता दुखी थी और न प्रशासनिक मशीनरी। जनता इसलिए खुश रहती थी कि जनहित में वे जो भी बात कह देते थे वह अवश्य पूरी होती थी और अधिकारी इसलिए खुश रहते थे कि श्री गुड़िया कभी कोई नाजायज काम के लिए दबाव नहीं बनाते थे । हां, जायज काम के लिए वह लापरवाही कतई बर्दाश्त नहीं करते थे ।श्री गुड़िया ने जीवन पर्यंन्त अपनी राजनीतिक ताकत को जिस तरह से बनाये रखा और प्रशासनिक रुतबे की मर्यादा बरकरार रखी उसकी उनके विरोधी आज भी उनकी तारीफ करते हैं। वास्तव में उनमें कमाल की प्रशासनिक क्षमता थी। उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है यह भी उन्हें बखूबी पता था ।

ऐसा नहीं कि वह जनता का ही हित सर्वोपरि समझते थे बल्कि किसी परेशानी में यदि कोई सरकारी अधिकारी अथवा कर्मचारी भी उनके पास आता था तो वह उसकी समस्या का भी समाधान करते थे।

सत्येंद्र चंद्र गुड़िया का रुतबा ऐसा कि जहां एक ओर आजकल के नेता अधिकारियों की चाटुकारिता करते नजर आते हैं वही एक जमाना था कि  प्रशासन और पुलिस के बड़े अधिकारी भी  गुड़िया की बैठक के बाहर खड़े होकर अपनी ड्रेस देखते थे कि ठीक है या नहीं। गुड़िया जी का मूड कैसा है ?बात करने की स्थिति में है या नहीं। उस जमाने में जिला नैनीताल हुआ करता था । श्री गुड़िया कभी किसी अधिकारी से मिलने नहीं जाते थे बल्कि नैनीताल से चलकर आला अधिकारी खुद उनसे मिलने आते थे । आज के नेता जहां थाने और पुलिस चौकियों में बैठे गिडगिडाते नजर आते हैं वही श्री गुड़िया अपने जीवन काल दो बार गए ।एक बार जब ,जब श्रीमती इंदिरा गांधी को जनता पार्टी की सरकार के दौरान गिरफ्तार किया गया तो तब वह उस गिरफ्तारी के विरोध में अपनी गिरफ्तारी देने गए थे और दूसरी बार तब जब लेन-देन के एक मामले में पुलिस काशीपुर के एक व्यापारी को उठा ले गई थी।  उस दिन जब श्री गुड़िया कोतवाली पहुंचे तो पूरा काशीपुर क्षेत्र हिल गया था कि आज देखो क्या होगा ? क्योंकि जो नेता कभी कोतवाली नही गया आज वह कोतवाली में आकर बैठा है। अपने लिए नहीं जनता की खातिर।

श्री गुड़िया के विरोधी खुद तो कुछ कर नहीं पाते थे मगर श्री गुड़िया के बारे में बातें जरूर करते थे कि श्री गुड़िया के पास जो ताकत है वह पंडित नारायण दत्त तिवारी की बदौलत है ।अगर यह बात मान भी लें तो  यह भी मानना पड़ेगा कि एन डी  तिवारी ने भी तो उन्हें यह ताकत कुछ सोच समझ कर ही दी होगी ।और सबसे बड़ी काबिलियत यह है कि जो ताकत श्री गुड़िया को पंडित तिवारी की वजह से मिली उसका उन्होंने मरते दम तक कहीं दुरुपयोग नहीं किया। न ही उन्होंने कभी पंडित नारायण दत्त तिवारी के नाम पर कोई बट्टा लगने दिया। एक मामला सन 1980 का है जब सत्येद्र चंद्र गुड़िया काशीपुर से विधायक थे । उस समय सी एस बख्शी नाम के एस डी एम यहां आए जिनमें प्रशासनिक दंभ कूट-कूट कर भरा था। वे जनहित के कामों में भी टालमटोल कर देते थे। यही कारण है कि उनकी श्री गुड़िया से कभी नहीं बनी और बात यहां तक आ पहुंची कि श्री गुड़िया ने अपने कुछ मित्रों को केंद्र में तत्कालीन मंत्री रहे  नारायण दत्त तिवारी के पास भेजा और संदेश दिया कि एस डी एम बख्शी काशीपुर में नहीं रहना चाहिए । पंडित तिवारी से इन लोगों की बात हुई । श्री तिवारी ने कहा कि यह तो उत्तर प्रदेश का मामला है। इस पर श्री गुड़िया के एक करीबी ने श्री तिवारी से कहा कि उत्तर प्रदेश भी तो हिंदुस्तान का ही एक हिस्सा है। यदि मामला उत्तर प्रदेश का है तो क्या वहां आपकी बात नहीं मानी जाएगी ?क्योंकि यह कड़वी बात काशीपुर के लोगों ने कही थी इसलिए पंडित तिवारी ने कोई प्रतिवाद नहीं किया और तुरंत उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को टेलीफोन कर कहा कि काशीपुर के एस डी एम का तत्काल तबादला कर दिया जाए और यदि मुख्यमंत्री वी पी सिंह कुछ पूंछे तो कह देना कि तिवारी जी का फोन आया था।

एक और वाकया जसपुर थाने का है। वहाँ एक दरोगा ने एक गरीब आदमी से 1000 रू की रिश्वत ले ली ।पीड़ित व्यक्ति श्री गुड़िया के यहां पहुंचा और आपबीती सुनाई । श्री गुड़िया ने तत्कालीन सीओ प्रदीप चंद्रा को फोन मिलाया और उन्हें सारी स्थिति बताते हुए तत्काल हिदायत दी कि दरोगा से रिश्वत वापस करा कर तुरंत मेरे पास भेजा जाए । सीओ श्री चंद्रा ने तत्काल दरोगा को तलब किया और रिश्वत वापस करा दी ।दूसरे दिन जब दरोगा श्री गुड़िया से मिलने पहुंचे तो उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह श्री गुड़िया के सामने जा सकें मगर डरते डरते गए क्योंकि मजबूरी थी। श्री गुड़िया ने दरोगा से कहा कि गरीब जनता को परेशान करना अच्छी बात नहीं और न ही रिश्वत लेना अच्छी बात है। लिहाजा या तो खुद अपना तबादला करा लो वरना मैंने तबादला कराया तो ऐसी जगह भेजूंगा कि जहां नौकरी करनी भी भारी पड़ जाएगी।

दौर था श्री गुड़िया की के जीवन के अंतिम समय का ।शरीर में ताकत नहीं थी लेकिन रुतबा वही था । काशीपुर के राजकीय एल डी भट्ट चिकित्सालय का नवीनीकरण हो रहा था ।अच्छी खासी मार्बल वाली मजबूत दीवारों को तोडकर करोडो रूपए खर्च कर टाइलें लगाई जा रही थी । जहां एक तरफ अस्पताल में बजट के अभाव में अनेक सुविधाओं का अभाव था वही करोड़ों रुपए की बेवजह की हो रही बर्बादी श्री गुड़िया को बर्दाश्त नहीं हुई । इन पंक्तियों के लेखक के सामने हुई एक घटना का विवरण इस प्रकार है।  नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे और तिलक राज बेहड़ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री । श्री बेहड को इस अस्पताल में चल रहे कार्य का निरीक्षण करने आना था ।कार्यक्रम चल रहा था कि अचानक श्री गुड़िया भी वहां पहुंच गए और उन्होंने मंत्री के सामने ही तत्कालीन सीएमओ को झाड़ा और  निर्माण कार्य पर गंभीर आरोप लगाए ।चूंकि विरोध सत्येंद्र चन्द गुड़िया कर रहे थे इसलिए तिलकराज बेहड़ भी कुछ नहीं बोल पाए और अपने कार्यक्रम को अंजाम दिए बगैर बीच में ही छोड़ वापस चलें गए थे। ऐसे थे सत्येंद्र चंद्र गुड़िया जो अपनी इन्ही खूबियों की वजह से आज भी काशीपुर की जनता को याद आते हैं।

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