@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो (02 अप्रैल, 2022)
कोरोना से लड़ने वाले वो योद्धा जो मरीजों की सैंपलिंग, टेस्टिंग से इलाज में जुटे थे उनके लिए अब सरकार के पास बजट नहीं है। कोविड में जब हम सब डरे हुए थे, तब स्वास्थ्य सेवाओं का जिम्मा अस्थायी चिकित्साकर्मियों ने संभाला। हालांकि अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने बजट न होने का हवाला देते हुए कोरोना काल में सेवाएं देने वाले डॉक्टरों सहित सभी अस्थायी कर्मचारियों को हटाने के आदेश जारी कर दिए हैं। ऐसा उस राज्य में जहां डॉक्टरों के आधे से ज्यादा पद खाली हैं, जहां सरकार ने हर साल दो लाख युवाओं को रोजगार देंने, 5 साल में एक करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वायदा किया है।
31 मार्च से पूरे मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में रखे गए अस्थायी डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ घर पर बैठ गए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से आया आदेश साफ कहता है कि इनके मानेदय के लिए अब बजट नहीं है, ऐसे में इनकी सेवाएं समाप्त होती हैं।
शरीर पर सफेद एप्रिन और गले में स्टेथेस्कोप साथ में ढेर सारी फिक्र. डॉ चंचल शर्मा कोरोना काल में अस्थायी चिकित्सक के तौर पर नियुक्त किए गए थे। 31 मार्च 2022 को उनके काम करने का आखिरी दिन था। भारी मन से अस्पताल से घर जा रहे डॉ. शर्मा कहते हैं “जब हाहाकार मचा था तो हमारे साथ लैब टेक्निशियन, आयुष डॉक्टर सब थे, लोग नहीं थे तब हम सेवाएं दे रहे थे, लेकिन अब दूध में पड़ी मक्खी की तरह सरकार ने हमें निकाल दिया हम इतना चाहते हैं कि सरकार संविदा में ही सही हमें कहीं रखे।”
ऐसे समय में जब लाशों को हाथ लगाने वाला भी कोई नहीं था, डॉ. सर्वेश नागर ने आयुष चिकित्सक के तौर पर अपनी सेवाएं आगर जिला अस्पताल को दीं थीं, लेकिन अब काम नहीं है। उन्होंने कहा, “टीस है हमने जिस परिस्थिति में काम किया सरकार ने हमारी कद्र नहीं समझी हमें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। परिवार परेशानी में है और मानसिक प्रताड़ना झेल रहा है।”
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