नैनीताल लोकसभा क्षेत्र से सासंद रहे स्व सत्येंद्र चंद्र गुड़िया एक समय राष्ट्रीय राजनीति में अपना अलग स्थान रखते थे। कांग्रेस को लंबे समय तक शीर्ष पर रखने वाले नेताओं में से एक गुड़िया जैसा मजबूत आधार स्तम्भ अब कांग्रेस के पास यहाँ नहीं है और उनके स्थान की पूर्ति उत्तराखंड में हो पाना मुमकिन नहीं है। अगले माह स्व गुड़िया की पुण्य तिथि आ रही है। कांग्रेस के इस कद्दावर नेता के व्यक्तित्व और कार्यों पर शब्द दूत न्यूज पोर्टल एक विशेष श्रृखंला आरंभ कर रहा है।
@शब्द दूत ब्यूरो (30 मार्च 2022)
काशीपुर । हजारों साल तक नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है, तब जाकर पैदा होता है चमन में एक दीदावर पैदा ।,
ऐसे ही नेता थे स्वर्गीय सत्येंद्र चंद्र गुड़िया । वह देश के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की गुड बुक में भी थे और उनके बाद सोनिया गांधी की भी गुड बुक में रहे। आलम यह था कि जब दूसरे सांसदों को भी राजीव गांधी तक अपनी कोई बात पहुंचानी होती थी तो वें श्री गुड़िया का सहारा लेते थे। राजीव गांधी उन्हें पर्वतीय क्षेत्र का नेता बनाना चाहते थे मगर पंडित नारायण दत्त तिवारी से करीबी रिश्तो के चलते उन्होंने अपनी सत्य निष्ठा नहीं गवांई। उन्होंने राजीव गांधी की बात को मानने से इंकार कर दिया या फिर यह कहें कि उन्होंने उनकी बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया।कारण साफ है कि उनके अन्दर कोई राजनीतिक स्वार्थ भावना नहीं थी ।वरना इतनी बड़ी अपॉर्चुनिटी को कौन छोड़ता है? ऐसे नेता थे सत्येंद्र चंद्र गुड़िया ।
वे एक नेता ही नहीं बल्कि अपने आप में ईमानदार राजनीति का एक अध्याय थे । ऐसे नेता बहुत कम दिखाई देते हैं। उनके दिल में सभी के विकास की भावना रहती थी। विकास के मामले में वें दलगत भावना से ऊपर उठकर हर संभव सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे ।जब कोई काम क्षेत्र की जनता व सामाजिक संगठनों को असंभव नजर आता था तो सभी की निगाह सत्येंद्र चंद्र गुड़िया पर जाती थी, और उस काम को श्री गुड़िया पूरा भी करा देते थे। उन्होंने जिस काम को कहा वह अवश्य हुआ और जिसे मना कर दिया वह हुआ ही नहीं। उनके न होने से आज आम जनमानस, राजनीतिक हस्तियों, समाजसेवी संगठनों, उद्यमियों, व्यवसायियों, शिक्षा व कानून विदो एवं आम जनता को इस दर्द का एहसास है कि काश श्री गुडिया आज हमारे बीच होते ।
आजादी के बाद देश के नेताओं के चरित्र में जहां एक ओर भयंकर गिरावट आई है वहीं नैनीताल संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे स्वर्गीय सत्येंद्र चन्द गुड़िया ने जीवन भर ईमानदार और आदर्श राजनीति की। उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया भले ही उन्हें इसकी एवज में राजनीतिक हानि भी झेलनी पड़ी। वह हमेशा जनसेवा के प्रति समर्पित रहे और विकास के प्रति दूरदर्शी सोच रखी। अपने सिद्धांतों के कारण ही आज भी वें हमारे बीच जिंदा है ।भ्रष्ट हो चुकी राजनीति के कीचड में भी वें कमल के समान खिले रहे। एक भी ऐसा उदाहरण नहीं कि जनहित के जिस काम को श्री गुड़िया ने चाहा हो और वह न हुआ हो। वें शिक्षा के प्रति हमेशा समर्पित रहे । उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि समझ में नहीं आ रहा कि उन्हें काशीपुर का सरदार पटेल कहे या फिर पंडित मदन मोहन मालवीय? श्री गुड़िया एक ऐसे राजनेता रहे जो हमेशा हमेशा याद आते रहेंगे। वें कांग्रेस के एक निष्ठावान सिपाही रहे ।उन्होने हमेशा अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल लोक हित में किया ।भ्रष्ट आचरण उन्हें कतई पसंद नहीं था और उनके जीवन की सबसे बड़ी खूबी यही रही कि अपराधियों को उन्होंने न तो कभी संरक्षण दिया और ने कभी उनसे ढले। उनके रहते काशीपुर ही नहीं बल्कि नैनीताल संसदीय क्षेत्र के लोग भी महसूस करते थे कि उनके बीच में उनका अपना कोई ऐसा नेता है जिसके रहते उनका कोई भी शोषण नहीं कर सकता। मगर अब वह बात कहां । नैनीताल संसदीय क्षेत्र तो क्या आज काशीपुर क्षेत्र में भी नेता तो घर घर में है मगर श्री गुड़िया जैसा हौसला और ताकत किसी में नहीं। श्री गुड़िया जनता का दर्द समझने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सरकारी मशीनरी का भी दर्द समझते थे।
यही कारण है कि सरकारी मशीनरी के कामकाज में उन्होंने कभी भी अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया, मगर जनहित के प्रति किसी भी अधिकारी या कर्मचारी ने अनदेखी की तो उसे उनके परशुराम रूपी कोप का भी सामना करना पड़ता था। वें थाने और कोतवाली की राजनीति से दूर रहते थे, मगर जब कभी पानी सिर से ऊपर उतरने पर फोन करते थे तो उनके फोन का अपना अलग ही वजूद होता था । वे केवल न्याय संगत कार्यों के लिए ही फोन करते थे इसलिए अफसर व कर्मचारी भी काम करने में संकोच नहीं करते थे ।वह जितने क्रोधी थे उससे भी अधिक सहज और शांत स्वभाव के भी थे ।उनके विरोधियों ने उनके विरुद्ध तथ्य हीन भ्रांतियां भी पैदा कर रखी थी ,मगर आज भी ऐसे अनेक लोग हैं जो दावा करते हैं कि यदि सही लोगों को श्री गुड़िया झिडक भी देते थे तो उनका काम भी जरूर हो जाता था।
जब सरकारी स्तर से काम कराने में सब नेता थक जाते थे तो सब की उम्मीद श्री गुड़िया ही होते थे। जिनके एक फोन पर काम हो जाता था। कुल मिलाकर वें जनता की उम्मीदों की किरण थे। जिस काम को सत्ता पक्ष के नेता भी नहीं करा पाते थे वह श्री गुड़िया विपक्ष में होकर भी करा देते थे ।यही उनके बड़े राजनीतिक कद की पहचान थी। वह क्षेत्र की राजनीति के पितामह थे और जब तक जिए शेर की तरह जिए । उनका हमारे बीच ना होना बहुत खलता है।
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