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उत्तराखंड: अनुसूचित जाति-जनजाति के वोटरों पर नजर, बदल सकते हैं राजनीतिक दलों का गणित

उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के चुनाव के हिसाब से देखें तो राज्य में अनुसूचित जाति व जनजाति के मतदाताओं का प्रभाव है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 13 और जनजाति के लिए दो सीटें आरक्षित हैं।

@शब्द दूत ब्यूरो (30 जनवरी, 2022)

चुनाव चाहे लोकसभा के हों अथवा राज्य विधानसभाओं के, सभी में अनुसूचित जाति और जनजाति के मतदाताओं पर राजनीतिक दलों की नजर रहती है। राज्य विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 13 और जनजाति के लिए दो सीटें आरक्षित हैं।

राज्य के मंत्रिमंडल में भी अनुसूचित जाति-जनजाति को हमेशा जगह मिलती आई है। राजनीतिक दलों द्वारा इन्हें लुभाने का बड़ा कारण इन वर्गों का मतदान के प्रति जागरूक होना भी है। राज्य में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 65.60 मतदान हुआ था। इनमें सबसे अधिक 74.60 प्रतिशत मतदान अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने किया था।

प्रदेश की राजनीति में अनुसूचित जाति-जनजाति के मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। प्रदेश की वर्ष 2021 की अनुमानित जनसंख्या के अनुसार अनुसूचित जाति की जनसंख्या 22 लाख और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं की जनसंख्या 3.38 लाख है। यह आंकड़ा 25 लाख से अधिक है। निर्वाचन आयोग के मापदंड के अनुसार कुल जनसंख्या का 61 प्रतिशत मतदाता बनने के योग्य हो जाता है। इसके अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जाति व जनजाति के मतदाताओं का प्रतिशत 18.50 पहुंचता है।

जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को नाराज करने की स्थिति में कोई दल नहीं रहता। सबसे अहम पहलू यह है कि ये वे मतदाता हैं जो सबसे अधिक संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचते हैं। पिछले चुनाव में हुए मतदान में 74.60 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 64.39 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं ने वोट डाले थे।

अनुसूचित जाति-जनजाति के मतदाताओं को रिझाने में इस समय सभी दल लगे हुए हैं। दरअसल, प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर अनुसूचित जाति के मतदाता ही प्रत्याशी की किस्मत तय करते हैं। वैसे भी यहां की विधानसभा सीटों पर निर्णय काफी कम अंतर से होता रहा है। ऐसे में जो अनुसूचित जाति के मतदाताओं को अपने पक्ष में कर ले, उसे उम्मीद बंधी रहती है।

राजनीतिक नजरिये से अभी तक की स्थिति देखें तो पर्वतीय क्षेत्रों में अनुसूचित जाति का वोट बैंक परंपरागत रूप से कांग्रेस का माना जाता रहा है, जबकि मैदानी क्षेत्र में इस पर एक दौर में बसपा, सपा का प्रभाव रहा है। राज्य गठन के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में बसपा को सात सीटें हासिल हुई थीं, जो अब शून्य पर सिमट चुकी है। अलबत्ता, सपा यहां कभी खाता नहीं खोल पाई।

भारत सरकार ने वर्ष 1967 में पांच जनजातियां थारू, बुक्सा, भोटिया, राजी एवं जौनसारी को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया है। इन पांचों जनजातियों में बुक्सा एवं राजी जनजाति अन्य जनजातियों से काफी पिछड़ी एवं निर्धन होने के कारण उन्हें आदिम समूह की श्रेणी में रखा गया है। बुक्सा जनजाति जो देहरादून जिले के विकासनगर, सहसपुर, डोईवाला, पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड दुगड्डा, हरिद्वार के विकासखंड बहादराबाद, (लालढांग परिक्षेत्र) ऊधमसिंहनगर के विकासखंड बाजपुर, गदरपुर, काशीपुर, नैनीताल के विकासखंड रामनगर, राजी जनजाति पिथौरागढ़ जिले के धारचूला, कनालीछीना, डीडीहाट एवं चम्पावत जिले के विकासखंड चम्पावत में मुख्य रूप सें निवासरत हैं।

उत्तराखंड में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिलेवार अनुसूचित जाति-जनजाति की जनसंख्या उत्तरकाशी में 80567, टिहरी में 79317, चमोली में 91577 है। वहीं राजधानी देहरादून में जनसंख्या 102130 है। पौड़ी में 228901, रुद्रप्रयाग जिले में 122361 जनसंख्या है।

इसी प्रकार कुमाऊं मंडल में अनुसूचित जाति-जनजाति की जनसंख्या पिथौरागढ़ में 120378, अल्मोड़ा में 150995, नैनीताल में 191206, बागेश्वर 72061, चम्पावत 47383 है। मैदानी जिलों उधमसिंह नगर अनुसूचित जाति-जनजाति की जनसंख्या 238264 और हरिद्वार में 411274 है।

उत्तराखंड में फिलहाल अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटें पुरोला, घनसाली, राजपुर रोड, ज्वालापुर, झबरेड़ा, पौड़ी, थराली, गंगोलीहाट, बागेश्वर, सोमेश्वर, नैनीताल, बाजपुर और भगवानपुर हैं।

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