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उत्तराखंड: राजनीति का अजब खेल, हरक सिंह रावत ने तोड़ा अपना रिकार्ड

साल 1984 में हरक सिंह रावत पहली बार वह भाजपा के टिकट पर पौड़ी सीट से चुनाव लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। इसके बाद वर्ष 1991 में उन्होंने पौड़ी सीट पर जीत दर्ज की थी। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार में उन्हें पर्यटन राज्यमंत्री बनाया गया था। हरक को वर्ष 1993 में भाजपा ने एक बार फिर पौड़ी सीट से अवसर दिया और वह फिर से जीत दर्ज कर विधानसभा में पहुंचे।

@विनोद भगत

(28 जनवरी, 2022)

इसे राजनीति का अजब खेल ही कहा जाएगा कि एक लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में दिग्गज के रूप में स्थापित और सीएम मैटेरियल एक अदद सीट के लिए तरस गया। चुनावी राजनीति का यह दमदार चेहरा पहली बार अपने ही टिकट के लिए तरसा और चुनाव मैदान से बाहर बैठने को मजबूर है।

दरअसल पूर्व मंत्री हरक सिंह के लिए परिस्थितियां ऐसी बनी की वे अंतिम समय में कांग्रेस में शामिल तो हुए लेकिन बेटिकट ही रह गए। उत्तराखंड में पांचवीं विधानसभा का चुनाव इस बात का गवाह बनने जा रहा है कि चुनावी राजनीति का यह दमदार चेहरा 1991 के बाद पहली बार चुनाव मैदान से बाहर केवल दर्शक की भूमिका में होगा।

हालांकि कांग्रेस में वापसी के बाद हरक सिंह ने कई विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रभाव का हवाला देकर यह संकेत देने की कोशिश भी की कि वह गढ़वाल की किसी भी सीट से चुनाव लड़ने को तैयार हैं। लेकिन कांग्रेस के भीतर स्थितियां ऐसी बनी कि पार्टी ने उनकी पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं को टिकट तो थमाया, लेकिन हरक सिंह को बाहर बैठने पर मजबूर कर दिया। वैसे बता दें कि हरक सिंह रावत कई बार 2022 विधानसभा चुनाव न लड़ने की इच्छा जता चुके हैं।

उत्तराखंड बनने के बाद वर्ष 2002 में हुए राज्य विधानसभा के पहले चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लैंसडाउन सीट से जीत दर्ज की थी। तब नारायण दत्त तिवारी सरकार में उन्हें मंत्री पद मिला, लेकिन बहुचर्चित जैनी प्रकरण के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। वर्ष 2007 में वह दोबारा लैंसडाउन सीट से विजयी रहे और कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहे।

उत्तराखंड की राजनीति में माना जाता है कि हरक सिंह गढ़वाल की किसी भी सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल करने में सक्षम हैं। यही वजह है कि हरक सिंह को बार-बार सीट बदलने की वजह से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि हरक सिंह विधानसभा सीट पर पांच साल बाद होने वाली एंटी इनकंबेंसी को भली भांति भांप लेने के विशेषज्ञ भी हैं। यही वजह है कि वे हर बार सीट बदलने के बाद भी जीतने में कामयाब रहते आए हैं।

वर्ष 2012 के चुनाव में हरक ने सीट बदलते हुए रुद्रप्रयाग से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2016 के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद हरक सिंह रावत कांग्रेस के नौ अन्य विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें कोटद्वार सीट से मौका दिया और उन्होंने वो सीट भी जीती थी।

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