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उत्तराखंड की राजनीति के चार बड़े मिथक, जो शिक्षा मंत्री बना उसे अगले चुनाव में मिली मात

@शब्द दूत ब्यूरो (27 जनवरी, 2022)

सत्तर सीटों वाली उत्तराखंड विधानसभा के लिए चुनाव 14 फरवरी को होना है। हर पार्टी अपनी-अपनी जीत के दावे कर रही है। लेकिन राज्य की कुछ सीट ऐसी हैं, जिन्हें यहां की राजनीति का बड़ा मिथक माना जाता है। ये मिथक दशकों से चले आ रहे हैं और हर पार्टी इन्हें बहुत ज्यादा गंभीरता से लेती है। आइए, आपको रूबरू कराते हैं उत्तराखंड की राजनीति के उन चार बड़े मिथकों से, जिन्होंने बरसों से यहां की सियासत में जनता को चकित किया हुआ है।

दरअसल ये मिथक साल 1952 से उत्तराखंड की राजनीति में बना हुआ है। तब निर्दलीय प्रत्याशी जयेंद्र जीते। जब वे कांग्रेस में शामिल हुए तो सरकार कांग्रेस की बनी। इमरजेंसी के दौर में जनता पार्टी जीती और सरकार बना ली। नौ नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड बना, तब भी यह मिथक नहीं टूटा। इस बार आम आदमी पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कर्नल अजय कोठियाल को इस सीट से प्रत्याशी बनाया है।

सूबे की राजनीति में यह मिथक भी खासा मशहूर है कि शिक्षा मंत्री चुनाव हार जाता है। वर्ष 2000 में अंतरिम सरकार में पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत शिक्षा मंत्री बने और 2002 में चुनाव हार गए। साल 2002 में नरेंद्र भंडारी शिक्षा मंत्री बने और 2007 के चुनाव में उन्हें मात मिली। वहीं, 2007 में एक के बाद दो शिक्षा मंत्री बने। लेकिन 2012 में ये दोनों हार गए। वर्ष 2017 में अरविंद पांडे शिक्षा मंत्री बने। सवाल है कि क्या इस बार मिथक टूटेगा या बरकरार रहेगा।

अल्मोड़ा ऐसी सीट है, जिसका तिलिस्म भी अजीब है। जो प्रत्याशी अल्मोड़ा सीट हार जाता है, सूबे में उसी की सरकार बन जाती है। साल 2002 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन इस सीट से बीजेपी प्रत्याशी ने जीत हासिल की। 2007 में बीजेपी ने सरकार बनाई लेकिन अल्मोड़ा से कांग्रेस के करण माहरा जीते। साल 2012 में बीजेपी उम्मीदवार अजय भट्ट के सिर जीत का सेहरा बंधा लेकिन सूबे में कांग्रेस की सरकार बनी। वर्ष 2017 में अजय भट्ट चुनाव हार गए और बीजेपी ने सरकार बना ली।

पहले मनोनीत मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद एनडी तिवारी भी चुनावी मैदान में नहीं उतरे। साल 2007 में बीसी खंडूरी सीएम बने। लेकिन अगला चुनाव हार गए। 2012 में हरीश रावत मुख्यमंत्री बने। साल 2017 में दो सीटों से लड़े और दोनों जगह से हार गए। सिर्फ भगत सिंह कोश्यारी एकमात्र अपवाद रहे। इस बार सीएम पुष्कर धामी की खटीमा सीट पर सबकी नजर बनी हुई है।

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