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उत्तराखंड: असमंजस में किशोर उपाध्याय, क्या ऐसे ही निपटा दिए जाएंगे पूर्व अध्यक्ष

हरक सिंह रावत जैसे घाघ कहे जाने वाले नेता ने तो अपनी राह तलाश ली और देर सवेर उनका विस्थापन भी हो जाएगा। लेकिन गांधी परिवार के करीबी कहे जाने वाले किशोर उपाध्याय के लिए चुनाव की इस बेला में ‘घर के न घाट के’ वाली कहावत फिलहाल सटीक बैठ रही है।

@शब्द दूत ब्यूरो (17 जनवरी, 2022)

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और तिवारी सरकार में औद्योगिक विकास राज्यमंत्री रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर उपाध्याय गांधी परिवार के करीबी माने जाते रहे हैं। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में वह टिहरी से चुने गए थे और फिर 2007 में दोबारा विधायक चुने गए।

वर्ष 2008 से 2012 तक प्रदेश प्रवक्ता के साथ कांग्रेस विधानमंडल दल के सचेतक के रूप में भी काम कर चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड विधानसभा चुनाव, 2012 में वह एक निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव हार गए। फिर 2014 से 2017 तक उत्तराखंड प्रदेश पार्टी अध्यक्ष रहे। उन्होंने यशपाल आर्य के बाद पदभार संभाला था। उनके कार्यकाल में पार्टी में एक बड़ा विद्रोह हुआ था। इसमें नौ विधायक सहित कई मंत्री भी शामिल थे और वे सारे बीजेपी से जुड़ गए।

साल 2017 के चुनावों में उन्होंने अपनी पुरानी सीट छोड़ सहसपुर से अपनी किस्मत आजमाई। लेकिन वह इस सीट से भी हार गए। किशोर उपाध्याय पर अब आरोप है कि वह पार्टी द्वारा लगातार दी जा रही चेतावनी के बाद भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं। दरअसल वह रेसकोर्स इलाके में बीजेपी के एक नेता से मुलाकात को लेकर सुर्खियों में आ गए। उसके बाद कांग्रेस असहज सी स्थिति में दिखाई दी। प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने उनको पार्टी के सभी पदों से हटा दिया।

पार्टी के केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव की ओर से उनको इस बाबत एक पत्र जारी कर कहा गया है कि वह बीजेपी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ लगातार तालमेल बनाए हुए हैं। कई बार चेतावनी दी गई, लेकिन इसके बावजूद वह पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे।

पार्टी प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव ने अपने पत्र में जिस सख्त लहजे का इस्तेमाल किया है, उससे साफ है कि पार्टी में किसी भी स्तर पर गुटबाजी या पार्टी विरोधी गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। कांग्रेस ने किशोर को चुनाव संचालन के लिए बनाई गई तमाम समितियों के सदस्य के साथ ही समन्वय समिति के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी दी थी।

बीजेपी के साथ-साथ उनके लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मुलाकात की बात भी कही जा रही है। किशोर कई मौकों पर ऐसे बयान भी देते दिखे, जिससे लगा कि वह पार्टी लाइन से बाहर जा रहे हैं।

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