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प्यादे बन गये आंदोलनकारी, तुम मांगते रहे गैरसैंण राजधानी

वेद भदोला 

अभागों किसके लिए और क्यों मांग रहे हो राजधानी गैरसैंण! राज्य भी तो मांगा था तुमने। भाजपा का कहना है कि हमने दिया राज्य। कांग्रेस भी यही तो कहती है। अब देख लो हो क्या रहा है! बारी-बारी से मूंग दल रही है तुम्हारी छाती पर। उत्तराखंड के असल आंदोलनकारी तो हाशिये पर हैं। लेकिन, ये बताओ कि इन धूर्त पार्टियों ने अपने-अपने प्यादों को आंदोलनकारियों का दर्जा दिया कि नहीं!

आपसे ये सवाल भी कि गैरसैंण राजधानी से किसका भला होगा! देखा नहीं कि ‘राजधानी’ देहरादून की अनाधिकृत झुग्गी बस्तियों के लिए कितने माननीय अपना होम करने को तैयार थे! भाजपाई मुख्यमंत्री से लेकर नेता विपक्ष तक बचाने में लगे थे अपनी इज़्ज़त। क्या तुमने ये भी नहीं देखा कि कितनी तत्परता से आया अध्यादेश!

मुझे ये कहते हुए कोई झिझक नहीं कि निरे मूर्ख हो तुम! क्योंकि, राज्य तो ढंग का मिला नहीं और तुम्हें राजधानी चाहिए, वो भी सुदूर गैरसैंण में। अरे पगलों, कोई माननीय क्यों जायेगा इतनी दूर। जबकि, देहरादून की वातानुकूलित विधानसभा और यमुना कॉलोनी के आवासों में ही जन्नत का मज़ा भोग रहे हैं ये हमारे भाग्य विधाता। इनके लिए देहरादून और गैरसैंण हर मौसम में एक जैसा ही तो ठैरा।

कितने नादान हो तुम जो तुम्हें आम और खीरे खाते पक्ष और विपक्ष नहीं दीखते। ये भी तुम्हें भान नहीं कि एक ही सिक्के की दो पहलू हैं ये पार्टियां। फिर किससे कह रहे हो कि राजधानी गैरसैंण!

आखिर में यही कहना चाहूंगा कि यदि आप अभी भी राजधानी के खोखले आंदोलन पर कायम हो, तो लगे रहो। क्योंकि, तुम्हारी औकात तो चैंपियन जैसे विधायक ने बता ही दी है। अगला परिसीमन भी तुम्हें तुम्हारी सही औकात बता देगा।

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