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काशीपुर विधानसभा सीट :2002 से कांग्रेस की हार का प्रतिशत बढ़ता रहा,इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की है तैयारी, पढ़िये खास विश्लेषण

@विनोद भगत

काशीपुर । काशीपुर विधानसभा सीट पर 2002 से जीत के लिए तरस रही कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती है कि इस बार वह 2022 में हार के सिलसिले को समाप्त कर दे। लेकिन कांग्रेस के लिए दो चुनौती सबसे बड़ी हैं। एक तो यह कि कांग्रेस यहाँ धड़ेबाजी से मुक्त हो और दूसरा तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी जीत की इस राह में रोड़ा साबित हो सकती है। हालांकि महानगर कांग्रेस अध्यक्ष संदीप सहगल पूरे दम खम के साथ संभावित दावेदार हैं जो जीत की कहानी लिखने को तैयार हैं। मुकाबला इस बार दिलचस्प और त्रिकोणीय होगा। 

2002 से लेकर अब तक के चुनाव में कांग्रेस को मिले मत लगातार घटते गये और भाजपा की जीत का अंतर बढ़ता रहा। कांग्रेस के नेताओं ने इस बढ़ते अंतर को नजरअंदाज करते हुए अपनी पुरानी रणनीति ही अपनाई। पुरानी मतलब एक तो धड़ेबाजी से मुक्त नहीं हो पाई और दूसरे ऐन चुनाव के मौके पर प्रत्याशी घोषित किये। जनता में जिस कांग्रेस नेता को लेकर माहौल बना उसके बजाय किसी अन्य नेता को टिकट दे दिया। इस बार भी कांग्रेस में स्थिति बदलती नहीं नजर आ रही है। स्पष्ट शब्दों में अगर कहा जाए तो महानगर अध्यक्ष संदीप सहगल इस समय काशीपुर कांग्रेस में फायर ब्रांड नेता हैं और जनता में यह संदेश भी है कि संदीप सहगल कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। पर इधर कांग्रेस से तमाम नेताओं की लगातार बयानबाजी से आम जन में भ्रम की स्थिति बन रही है। शहर के कांग्रेस नेताओं के अलग अलग बयान एक ही मुद्दे पर आ रहे हैं। बयान देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। 

बात करते हैं 2002 से अब तक कांग्रेस को मिले मतों की। तो 2002 में कांग्रेस प्रत्याशी के सी सिंह बाबा को 18201 मत मिले थे और विजयी प्रत्याशी भाजपा के टिकट पर पहली बार उद्योगपति से राजनेता बने हरभजन सिंह चीमा को 18396 मत मिले। जीत का अंतर 200 से भी कम मतों का था। केसीबाबा की काशीपुर से हार की उस वक़्त यहाँ कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन ऐसा हुआ। बहरहाल कांग्रेस खेमे में इस बात का संतोष था कि इतने थोड़े मतों से हार अगले पांच साल में कवर हो जायेगी। लेकिन 2007 में अप्रत्याशित रूप से कांग्रेस तीसरे नंबर पर आ गई और एक युवा व नये प्रत्याशी समाजवादी पार्टी के जुबैर अहमद ने दूसरे स्थान पर आकर सबको चौंका दिया था।

2012 में कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग 2300 मतों का अंतर रहा। 31756 मत हासिल कर भाजपा ने कांग्रेस के मनोज जोशी को पराजित किया। लेकिन 2017 में भाजपा विधायक हरभजन सिंह चीमा के 15 वर्ष की एंटीइंकंबैसी का लाभ उठा कर कांग्रेस को पूरा भरोसा था कि इस बार जनता भाजपा को शिकस्त देगी। लेकिन परिणाम जब आये तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका था। पचास हजार से अधिक मत प्राप्त कर चीमा ने कांग्रेस को 20000 मतों से हराकर प्रंचड जीत हासिल की। हालांकि इस बार पूरे प्रदेश में कांग्रेस की हालत पतली रही।

ब एक बार फिर विधानसभा चुनाव आसन्न है। कांग्रेस को अपनी जीत की पूरी आशा है। पर यहाँ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुश्किल है कि कांग्रेस में कांग्रेस की जीत की आशा से ज्यादा यहाँ के नेता व्यक्तिगत रूप से से खुद को जीता हुआ मान रहे हैं। किसी एक नेता के पीछे चलने के बजाय हर नेता आगे चल रहा है हालांकि उसके पीछे जगह खाली है। बात करें संदीप सहगल की तो फिलहाल वह काशीपुर में कांग्रेस के उन नेताओं में से हैं जो संगठन के साथ चल रहे हैं। एक तरह से जनता में उनको लेकर एक माहौल बना हुआ है। 

इस बार के विधानसभा चुनाव में एक सबसे बड़ा फैक्टर आम आदमी पार्टी भी है। कम समय में आम आदमी पार्टी से राजनीति में पदार्पण कर उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी दीपक बाली ने जिस तरह से इस विधानसभा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है वह भाजपा कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। भाजपा कांग्रेस दोनों ही दलों से अभी प्रत्याशी के नाम को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। लेकिन आम आदमी पार्टी से कई माह पूर्व से यह लगभग तय हो चुका है कि दीपक बाली ही यहाँ से चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में स्थानीय मतदाताओं में इस पार्टी के प्रत्याशी को लेकर कोई भ्रम की स्थिति नहीं है। अन्य दलों से कई नेता खुद को दावेदार बता रहे हैं लेकिन दीपक बाली अकेले अपने समर्थकों के दम पर जनता के बीच यह संदेश पहुंचा पाने में कामयाब रहे हैं कि चुनाव कौन लड़ेगा। जीत या हार तो भविष्य के गर्भ में है पर जनता के बीच लगातार बने रहकर दीपक बाली आधी लड़ाई तो जीत चुके हैं। 

बहरहाल भाजपा और कांग्रेस से प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हुई है। और दावेदारों में आपस में घमासान जरूर शुरू हो गया है। 

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