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चार सरकारें बीस साल: राज्य की जनता के मुद्दे अभी भी अनसुलझे

आज बीस साल बाद, चार-चार सरकारों के बावजूद भी राज्य में जनसरोकार के मुद्दे गायब हैं। उत्तराखंड की राजनीति में पलायन, शिक्षा, रोजगार, खेती-किसानी जैसे मुद्दे दूसरे नंबर पर हैं।

@शब्द दूत ब्यूरो (27 नवंबर, 2021)

विधानसभा चुनावों में प्रदेश से जुड़े परंपरागत मुद्दे हों या फिर परिस्थितिजन्य मुद्दे। हर चुनाव में सत्ताधारी पार्टियों की हार के तौर पर ये मुद्दे प्रभावी तो हुए, लेकिन इनसे जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। साल 2002 के चुनाव से लेकर 2021 तक के चुनाव में कई मुद्दे ऐसे हैं जो जस के तस बरकरार हैं।

पहली निर्वाचित सरकार के लिए वर्ष 2002 में उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव हुए। उस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा अंतरिम सरकार के घोटाले थे। इन मुद्दों के दम पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस सत्ता में आ गई। यह बात अलग है कि इन मुद्दों को लेकर बाद में कांग्रेस ने खामोशी अख्तियार कर ली। एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बने और पूरे पांच साल सरकार चलाई। उनकी इस सरकार ने ही 2007 के चुनावी मुद्दों को जन्म दिया।

वर्ष 2007 में विधानसभा के चुनाव हुए। एक बार फिर चुनाव से जनता के मुद्दे गायब थे। एनडी तिवारी सरकार में करीब 300 नेताओं को लालबत्ती बांटने के मामले को भाजपा ने इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया। भाजपा ने कांग्रेस राज के 56 घोटालों का मुद्दा भी बनाया। यह बात अलग है कि इन मुद्दों पर कांग्रेस से सत्ता छीनने वाली भाजपा सत्ता में आने के बाद 56 घोटालों को भी भूल गई। आयोग बनाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। लालबत्तियों के मामले में जरूर सरकार दबाव में रही।

सत्ता से पांच साल दूर रहने वाली कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के कार्यकाल और घोटालों को मुद्दा बनाया। भाजपा ने 2007 से 2012 के बीच तीन मुख्यमंत्री बनाए। पहले मेजर जनरल बीसी खंडूरी (रिटायर्ड) ने 839 दिन सत्ता संभाली। इसके बाद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने 808 दिन सरकार चलाई।

केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव के समय दोबारा मेजर जनरल बीसी खंडूरी को सत्ता सौंप दी, जिन्होंने 185 दिन सरकार चलाई। लिहाजा, कांग्रेस ने भाजपा में हुए कथित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले, पन बिजली परियोजनाओं के आवंटन और दवा घोटालों को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा। सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई लेकिन इन घोटालों पर कार्रवाई के नाम पर केवल बजट ठिकाने लगा। कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

2017 का विधानसभा चुनाव आया तो भाजपा के हाथ चुनाव से ऐन पहले सबसे बड़ा मुद्दा हरीश रावत के स्टिंग का आ गया। भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए जनता के बीच आवाज उठाई। जनता ने समर्थन भी दिया। इस बार दागी-बागी के खेल में कांग्रेस पिछड़ गई। बड़ी संख्या में कांग्रेस के विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने सत्ता में दमदार वापसी की। यह बात अलग है कि स्टिंग प्रकरण अभी हाईकोर्ट में लंबित है।

जिस आपदा राहत को विजय बहुगुणा के कार्यकाल में भाजपा ने मुद्दा बनाया था, वह 2017 के चुनाव से ठीक पहले विजय बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने के साथ ही गायब सा हो गया। किरकिरी के बीच कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई।

चूंकि 2017 से 2021 के बीच प्रदेश में जुड़े कई परंपरागत मुद्दों पर भी काम हुआ। त्रिवेंद्र सरकार में पलायन पर काबू पाने के लिए पलायन आयोग का गठन किया गया। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई गई। बेरोजगारी को लेकर भी भाजपा सरकार ने तमाम दावे किए हैं। लिहाजा, इस बार के चुनाव में यह मुद्दे उभरकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, गैरसैंण राजधानी के साथ ही नए जिलों का गठन आदि मुद्दों पर आवाज उठा रही हैं। 

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