यूं तो उत्तराखंड में एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा की परंपरा अभी तक कायम है। इस बार कांग्रेस सत्ता में वापिसी के लिए बेताब है तो वहीं भाजपा 2022 के चुनावी संग्राम में अब तक का सबसे अनूठा रिकार्ड बनाने को बेताब दिखाई दे रही है।
@शब्द दूत ब्यूरो (23 नवंबर, 2021)
उत्तराखंड के सियासी समर के लिए सेनाएं सजने लगी हैं। विधानसभा चुनाव के रण में उतरने के लिए चिर प्रतिद्वंद्वी भाजपा और कांग्रेस एक बार फिर आमने-सामने हैं। दोनों ही दलों का चुनावी इतिहास राज्य में दो-दो चुनाव जीतने का है। सत्तारोधी रुझान की हवा पर सवार होकर दलों ने चुनावी वैतरणी पार की और प्रदेश में सरकार बनाई। लेकिन 2002 को छोड़कर 2017 और 2012 में भाजपा और कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। दोनों दलों ने जोड़तोड़ से सरकार बनाई। अलबत्ता, 2017 में भाजपा ने प्रचंड बहुमत का रिकाॅर्ड बनाया और सत्ता पर काबिज हुई।
एक बार फिर भाजपा 2022 के चुनावी संग्राम में अब तक का सबसे अनूठा रिकार्ड बनाने को बेताब दिखाई दे रही है। प्रदेश में सत्ता में कांग्रेस के बाद भाजपा और भाजपा के बाद कांग्रेस के मिथक इस बार तोड़ देना चाहती है। इसलिए उसने ‘अबकी बार साठ पार’ का लक्ष्य बनाया है। कांग्रेस एक फिर केंद्र और राज्य के सत्तारोधी रुझान के दम पर चुनावी नैया पार करने की सोच रही है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, गैरसैंण, देवस्थानम बोर्ड और भू कानून कांग्रेस के मुख्य चुनावी हथियार हैं।
इन चिर प्रतिद्वंद्वियों के मध्य आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के चुनावी फाॅर्मूले के साथ उत्तराखंड के समर में उतर गई है। भाजपा और कांग्रेस के दो राजनीतिक विकल्पों के बीच वह प्रदेश की जनता को तीसरा विकल्प देने की कोशिश कर रही है। तीसरे विकल्प की दौड़ में बसपा, सपा, यूकेडी व वामपंथी दल भी शामिल हैं लेकिन पिछले चार चुनाव का रिकार्ड बता रहा है कि उनकी भूमिका अब उपस्थिति दर्ज कराने और वोटों के समीकरण को मामूली अंतर से प्रभावित करने की रही है।
कुल मिलाकर 2022 का चुनाव समर बेहद रोमांचक होने के आसार हैं। कांग्रेस की वापसी का इरादा और आम आदमी पार्टी की रणनीति ने चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेंगे, वैसे-वैसे चुनावी संग्राम का रोमांच चरम पर पहुंचेगा।
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