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प्रसंगवश:”संगदिल नहीं रहमदिल है सरकार “शव की मूंछें उखाड़ देने से अर्थी का बोझ कम नहीं होता, पेट्रो पदार्थों की कीमत घटाने पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की टिप्पणी

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

केंद्र सरकार ने देश की आहें भरती जनता को दीपावली का तोहफा दे दिया है.अब आप अपनी स्कूटी में पांच रूपये का ज्यादा पेट्रोल और साल भर से आंदोलनरत किसान दस रूपये का ज्यादा पेट्रोल ले सकते हैं .इन दोनों तरल ईंधनों के दाम राकेट की गति से बढ़ रहे थे .सरकार को जब लगा की आम जनता अब इस रोजाना की मूल्यवृद्धि की वजह से दम तोड़ देगी तो उसने रहमदिली दिखाई है .हम जैसे जन्मजात आलोचक इस फैसले को ‘ ऊँट के मुंह में जीरा ; जैसा ही बताएँगे ,किन्तु आप जो चाहे कह सकते हैं ,क्योंकि राहत आपको मिली है .

आजकल दुनिया को तरह-तरह के मन्त्र दे रहे हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को शायद नहीं पता कि हमारे यहां अर्थी पर पड़े शव की मूंछें उखाड़ देने से अर्थी का बोझ कम न होने के मुहावरे भी हैं .जनता के कन्धों पर रखी मंहगाई की अर्थी का बोझ इन पांच-दस रूपये की कटौती से कितना हल्का होगा ,कहना कठिन है ,फिर भी इस फैसले का स्वागत तो करना ही होगा .हमइस फैसले का स्वगत करते हैं और चाहते हैं की उप चुनावों में ऊदबिलाव की मुद्रा से जाएगी केंद्र सरकार को देश भर की राज्य सरकारों से भी आग्रह करना चाहिए की वे भी इन दोनों ईंधनों के ऊपर से अपने हिस्से का कर कम करें .

केंद्र सरकार ने जो दरियादिली दीपावली पर दिखाई है ,यदि उसे बहुत पहले दिखा दिया होता तो जनता को त्राहि-त्राहि न करना होता .पेट्रोल और डीजल के दाम करने से सरकार के खजाने में कितनी कमी आएगी ये किसी ने नहीं बताया,मुमकिन है वजीरे खजाना इस वारे में अभी जानते ही न हों ,या जानबूझकर अनजान हों. सरकार ने आम आदमी को मुर्गा समझ लिया है.सरकार आम आदमी यानि मुर्गे के पंख तब तक नोचती है जब तक कि बेचारा हाहाकार न करने लगे .मुर्गे की चीख-पुकार करने कि लिए उसके आगे कुछ दाने डालकर नोंचानाची को स्थगित कर दिया जाता है ,ताकि मुर्गे की चीखें कुछ देर कि लिए बंद हो जाएँ ,और मुर्गा सरकार की तरफ कृतज्ञता से भर जाये .

हाल कि उपचुनावों में हिमाचल में भाजपा की जो फजीहत हुई है उससे पार्टी नेतृत्व की समझ में आ गया है कि अब जनता के साथ लूटपाट और दिनों तक नहीं चल सकती .भाजपा अभी शायद पेट्रोल और डीजल के दाम कम न करती तड़ी उसके सामने उत्तर प्रदेश के चुनाव न होते .उत्तर प्रदेश जीते बिना देश पर राज करना भाजपा क्या किसी भी दल के लिए एक दिवास्वप्न जैसा है .इसलिए आम जनता को यदि आभार मानना है तो उत्तर प्रदेश का माने.ये हार का ही दर है की केंद्र के बाद भाजपा शासित पांच अन्य राज्यों ने भी पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले वेट में भी कटौती कर दी है ,इससे इन राज्यों में पेट्रोल 12 रूपये और डीजल 17 रूपये सस्ता हो जाएगा .केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल पर 5 रुपये और डीजल पर 10 रुपये एक्साइज ड्यूटी घटाने के बाद कर्नाटक, गोवा, असम, त्रिपुरा और मणिपुर की बीजेपी सरकारों ने वैट पर 7 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है।

जनता की कमर तोड़ने के बाद उस पर मरहम लगाने में भाजपा की कोई सानी नहीं है.मुमकिन है की आजकल में शेष भाजपा शासित सरकारें भी इसी तरह वेट में कमी कर वाहवाही बटोरने की कोशिश करें .इस तरह के फैसले सभी राज्य सरकारों को करना चाहिए ,तभी वास्तव में जनता को राहत मिल सकती है .मुश्किल ये है की हमारी सरकारें जनहित के बजाय दलहित में फैसले करतीं हैं .फैसलों की ये राजनीति ही लोकतंत्र और आम जनता के लिए परेशानी का सबब है .उल्लेखनीय है की राज्य सरकारें पेट्रोल और डीजल पर 25 से 30 फीसदी तक वेट वसूल करतीं हैं .केंद्र ने इस साल पेट्रोल 28 रूपये और डीजल के दाम 26 रूपये बढ़ाए हैं .

पेट्रोल-डीजल की यह कीमतें तब हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में 2014 की तुलना में भारी गिरावट आई है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अन्य चीजों पर भी हो रहा है। डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के कारण मालभाड़े में बढ़ोतरी हुई है। इसके कारण आवश्यक चीजों के दाम तेजी से बढ़े हैं। दाल, सब्जी, अनाज, रेडीमेड खाद्य पदार्थों की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। मोदी जी ने 2014 में जब सत्ता सम्हाली थी तब देश में पेट्रोल प्रति लीटर 66 रूपये और 50 रूपये लीटर बिकता था ,कल तक इसके दाम 120 रूपये प्रति लीटर तक पहुँच गए थे .सरकार ने इन दामों को लेकर अपने दोनों हाथ खड़े कर दिए थे लेकिन अब अचानक केंद्र को आम जनता के आंसू द्रवित कर गए हैं .

बहरहाल पराजय और पराभव के डर से ही सही ,केंद्र ने जो निर्णय किया है उसका स्वागत करते हुए अब जरूरी है की जनता नेताओं को इस स्थिति का राजनीतिक लाभ न लेने दे .जनता को झांसे में आने से बचना होगा ,अन्यथा जिस एक झटके से पेट्रोल और डीजल की कीमतें नीचे आयीं हैं उसी तरह एक झटके में अपनी पुरानी स्थिति में भी पहुँच सकतीं हैं .केंद्र एक तीर से दो शिकार करना चाहता है. उसे एक तरफ उत्तर प्रदेश और पंजाब जीतना है और दूसरी i तरफ किसान आंदोलन की हवा भी निकालना है. जनता का दिल जीतने का केंद्र का इरादा न पहले था और न आज है .महाराष्ट्र में केंद्र जिस तरह से सत्तारूढ़ एनसीपी कि साथ खेल, खेल रहा है उससे जाहिर है की भाजपा ने प्रतिशोध की राजनीति का परित्याग नहीं किया है.यही प्रतिशोध आने वाले दिनों में जनता से भी लिया जा सकता है अब देखना ये है कि केंद्र कामयाब होता है या देश की जनता .
@ राकेश अचल

 

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