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लोकतंत्र का ‘ कलंक ‘ ‘वीआईपी- वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की कलम से खरी बात

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

 

लोकतंत्र में वीआईपी संस्कृति की अमरबेल लगातार फैलती जा रही है.अब ये आंग्ल संस्कृति भारतीय लोकतंत्र के लिए कलंक बन चुकी है. लगता है जैसे किसी का खुद वीआईपी होना या उसके परिवार से जुड़े होना कोई विशेषाधिकार है ,जिसका सम्मान क़ानून को बला- ए – ताक रखकर किया जाना चाहिए .मध्यप्रदेश में ये घटिया संस्कृति अब पूरे उफान पर है .और इसे ‘एन्जॉय’ करने का हक मंत्री सुतों को हासिल है .
बड़ी और मंहगी कार में बैठना,कार के सर पर लाल बत्ती और हूटर सजाकर घूमना जैसे वीआईपी का विशेषाधिकार है. जब इस तरह के श्रंगारित वाहनों में बैठकर कोई निकले तो उसके लिए सारे रास्ते खाली कर दिए जाना चाहिए . इन वाहनों में बैठने वालों के लिए न कोई कायदा होना चाहिए और न क़ानून . कोई नाका इन्हें न रोके और यदि रोके तो या पिटे या फिर गालियां खाये या फिर तबादले की तलवार से काट दिया जाये .
हाल ही में मामा सरकार के परिवहन मंत्री और मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के बेटों ने इस वीआईपी संस्कृति का कथित रूप से उल्लंघन करने पर एक टोल टैक्स के प्रबंधन की माँ-बहन एक कर दी .परिवहन मंत्री के बेटे ने एक यातायात निरीक्षक की बीच सड़क पर हवा निकालने की कोशिश की .ये दोनों दुस्साहसी इतने की इनके वीडियो और ऑडियो बनाये गए ,लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा .यानि कोई कर्मचरी मंत्री सुतों को न रोक सकता है और न उनसे दस्तावेजों की मांग कर सकता है .वे तीसरी दुनिया से आये होते हैं .
प्रदेश और देश में इन तथाकथित वीआईपी और उनके बेटों के ऐसे तमाम किस्से आये दिन प्रकाश में आते रहते हैं लेकिन उन्हें या तो रफादफा कर दिया जाता है या फिर उनका संज्ञान ही नहीं लिया जाता .बीते सालों का किस्सा आपको याद होगा ही कि इंदौर में कैसे एक मंत्री सुत ने निगम कर्मियों पर क्रिकेट का बल्ला तान लिया था .मंत्री और उनके बेटे हों या उनसे मिलते-जुलते अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी अपने आपको किसी से कम समझना तो दूर क़ानून से ऊपर समझते हैं .और उन्हें इसकी ताकत देता है हमारा सिस्टम .
मंत्री जन सेवा का संकल्प लेकर पद और गोपनीयता का शपथ लेते हैं लेकिन पद पर आते ही सब कुछ भूलकर अपनी सेवएं करने में डूब जाते हैं .एक अदना तो छोड़िये केंद्रीय मंत्री तक प्रशासन से अपने सत्कार,आवास,सुरक्षा के साथ ही पायलट और फॉलो वाहन की मांग करता है .प्रशासन इन सबके लिए अलग से राजपत्रित अधिकारी की ड्यूटी लगता है लेकिन इन मंत्रियों का पेट नहीं भरता इसलिए संभाग स्तर के अधिकारी इनकी अगवानी और विदाई सीमा पार होने तक करने जाते हैं .
मुझे याद है कि एक जमाने में मध्यप्रदेश के एक विधानसभा अध्यक्ष जिन्हें विंध्य का ‘ सफेद शेर ‘ कहा जाता था इस तरह की संस्कृति के पोषक थे. वे रीवा जिले के थे लेकिन उन्हें सतना रेलवे स्टेशन पर लेने और छोड़ने रीवा के कलेक्टर और एसपी जाते थे. बेचारे अफसरों को सफेद शेर के पैर भी छूना पड़ते थे .अब सफेद शेर नहीं हैं तो उन्हीं के इलाके में वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष के पुत्र हैं .सागर में परिवहन मंत्री के पुत्र हैं .और ऐसी अमरबेलें लगभग हर जिले या संभाग में हैं .’बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ ,छोटे मियाँ सुभानअल्लाह ‘.आजकल हमारे ऐतिहासिक ग्वालियर शहर में यही सब हो रहा है .कमिश्नर और आईजी तक केंद्रीय मंत्रियों की अगवानी और विदाई करते हुए हलकान हैं .अब तो इन मंत्रियों के परिजनों तक को वही सलूक चाहिए जो मंत्रियों को दिया जाता है .
मुझे याद है कि पहले अनेक मंत्री ऐसे थे जो कम से कम अपने शहर में तो एक आम आदमी की तरह आते-जाते थे.लाल बत्ती के वाहनों का इस्तेमाल नहीं करते थे.पायलट-फॉलो नहीं लेते थे.सुरक्षा के नाम पर एक ‘गनर’ उनके साथ हो तो भी बड़ी बात होती थी .लेकिन अब स्थिति बदल गयी है. अब इन वीवीआईपी लोगों के साथ वीआईपी भी लगे रहते हैं सो प्रशासन का बोझ दोगुना हो जाता है .और ये सब जनता के पैसे पर हो रहा है,लेकिन कोई रोकने वाला नहीं .रोके भी तो कौन और किस मुंह से .सब तो एक रंग में रंगे हुए हैं .
दुनिया के सबसे मजबूत देश अमेरिका में मैंने सड़क पर राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के अलावा कोई तीसरा वीआईपी कभी नहीं देखा.वहां सड़क पर क़ानून सभी के लिए एक है. न किसी के लिए यातायात रोका जाता है और न किसी को टोल नाकों पर से मुफ्त में गुजरने की छूट दी जाती है .चीन में भी लगभग ऐसा ही होता है .लेकिन भारत में ऐसा न होता है और शायद न हो पायेगा .क्योंकि यहां सड़कों पर ही नहीं मंदिरों तक में वीआईपी को विशेषाधिकार प्राप्त हैं .वे पूजा करने जाएँ तो भगवान तक उनके लिए हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं .जनता कतार में लगी रहती है. मेले में जाएँ तो पूरा मेला बंद कर दिया जाता है .सिनेमा देखने जाएँ तो आगे-पीछे की कतारें खाली करा दी जातीं हैं .वीआईपी का कतार में लगना अपमानजनक माना जाता है .वीआईपी का अपमान देश के संविधान का अपमान होता है शायद .वीआईपी संविधान से बड़े होते हैं शायद !
हमारे यहाँ वीआईपी संस्कृति में धीरे -धीरे नेताओं के अलावा दूसरे लोग भी शामिल हो गए हैं. इनमें मी लॉर्ड्स हैं,पुलिस है,प्रशासनिक अफसर हैं ,पत्रकार हैं ,जो नहीं हैं वे भी कोशिश कर रहे हैं कि इस जन्म में न सही लेकिन अगले जन्म में तो कम से कम भारत में जन्म लें और वीआईपी हो जाएँ .कभी-कभी लगता है कि हम वीआईपी रहित समाज में रह ही नहीं सकते .वीआईपी बिना सब सूना-सूना लगता है .वीआईपी जैसे इस लोकतंत्र के मुकुट में लगी कोई मणि है .
हमारे समाज ने जाने-अनजाने इस वीआईपी संस्कृति को अंगीकार कर लिया है .हमारे यहां तो व्यापारियों की शीर्ष संस्थाएं तक मंत्रियों के साथ -साथ उनके बेटों के लिए तक पलक-पांवड़े बिछाने में लज्जा अनुभव नहीं करतीं,क्योंकि जानतीं हैं कि आने वाला कल उन्हीं का है .क़ानून उनके लिए आम आदमी की तरह व्यवहार कर ही नहीं सकता .वे क़ानून से ऊपर हैं,थे,और भविष्य में भी रहेंगे .मुझे लगता है कि वीआईपी संस्कृति सामंतवाद का विकृत स्वरूप है.आप इसे नव-सामंतवाद भी कह सकते हैं .जो सियासत से लेकर सभी क्षेत्रों में अपने पांव पसार रहा है. वीआईपी के ऑक्टोपस की तरह 9 दिमाग,3 सर और खून नीला होता है .
@ राकेश अचल

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