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कंधार से सिंघु सीमा तक तालिबान

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

मैंने बहुत पहले ही कहा था कि तालिबान केवल अफगानिस्तान की समस्या नहीं है ,ये एक मानसिकता है जो घर-घर में मौजूद है. अफगानिस्तान के कंधार से भारत के सिंघु बार्डर तक तालिबान अलग-अलग चेहरों के साथ प्रकट हो रहा है लेकिन हम इसे मार नहीं पा रहे हैं. तालिबानी मानसिकता दरअसल कलियुग का रावण है .हम जितने इसके पुतले जलाते हैं , ये उतने ही वेग से हमारे सामने आ जाता है .

कंधार की मस्जिद में विस्फोट कर 32 लोगों की जान लेना या लखीमपुर खीरी में किसानों या छत्तीसगढ़ में नवदुर्गा के जुलूस पर कार चढ़ाकर लोगों को रौंदना या फिर सिंघु सीमा पर एक दलित युवक की नृशंस हत्या कर उसका शव किसान मंच के सामने लटका देना तालिबानी मानसिकता का विकृत चेहरा नहीं तो और क्या है ? नृशंसता ने राजनीति में सत्ता में,समाज में यानि जहां जगह मिली अपने पांव जमा लिए हैं ,और हम हैं कि खड़े तमाशा देख रहे हैं .आप कश्मीर में अल्पसंख्यकों की हत्या को भी इसी मानसिकता का प्रतीक मान सकते हैं .

अफगानिस्तान में तालिबान का सत्तारूढ़ होना एक दुःस्वप्न हो सकता है किन्तु हिन्दुस्तान में तालिबानी मानसिकता का पनपना क़ानून के राज की शिथिलता का नतीजा है .यहां हर कोई न्यायाधीश बनकर सजा देना चाहता है. उसे संसद द्वारा बनाये गए क़ानून और देश की अदलातों पर शायद यकीन ही नहीं बचा है ,लखीमपुर खीरी में एक केंद्रीय मंत्री का बेटा किसानों के ऊपर अपनी जीप चढ़ाकर उन्हें आंदोलन करने की सजा दे देता है तो छत्तीसगढ़ में गांजे से भरी जीप के तस्कर श्रृद्धालुओं की भीड़ पर अपनी जीप चढ़ाकर निर्दोष लोगो की जान ले लेते हैं .सिंघु सीमा पर निहंग एक दलित युवक को पवित्र ग्रन्थ का कथित अपमान करने की सजा उसकी जान लेकर देते हैं .राजस्थान में एक युवक को प्रेम करने की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है .यानि देश का हर हिस्सा इस तालिबानी मानसिकता की गिरफ्त में है .

देश में सात साल के कथित राम राज में तालिबानी मानसिकता यदि इतनी तेजी से बढ़ रही है तो चिंता का विषय तो बन ही जाता है .दुर्भाग्य ये है कि हम इस मसले पर चिंतन करने के बजाय ऐसी घटनाओं पर राजनीति करने में उलझ जाते हैं .हमें लगता है कि इन हिंसक वारदातों के लिए केवल सरकारें गिरा देने या किसी मंत्री का इस्तीफा हो जाने से बात बन जाएगी !! बिलकुल नहीं बनेगी .बन ही नहीं सकती . इस मानसिकता से निबटने के लिए हमें एक बार फिर क़ानून का इकबाल बुलंद करना होगा .गांधीवाद को दोबारा सुदृढ़ करना पडेगा ,किन्तु हम कर उलटा रहे हैं. हम गौड़सेवाद को मजबूत कर रहे हैं. उसे महिमामंडित करने के लिए गांधी को लांछित कर रहे हैं ,कर ही नहीं रहे बल्कि बेशर्मी से कर रहे हैं .

नृशंसता मनुष्य के भीतर छिपी पशुता का ही विकृत स्वरूप है .मनुष्य के भीतर पशुता का अंश मनुष्य की रचना करने वाले की भूल हो सकती है किन्तु हम मनुष्य, जहर से भी दवा बनाने की विधियां खोजने में दक्ष हैं ,बावजूद इसके हमने अब तक तालिबानी मानसिकता के शमन की विधि ईजाद नहीं की है.

यहां हमारा हर विज्ञान,मनोविज्ञान,साधना,योग विफल है. तालिबानी मानसिकता को रोकने में जिस धर्म को काम आना चाहिए था वो ही इसका पोषक बन गया है .इसे आप अपना दुर्भाग्य कह सकते हैं. धर्म से कुछ कहेंगे तो आपके साथ भी वो ही सब कुछ हो सकता है जो सिंघु सीमा पर लखबीर सिंह के साथ हुआ .

चिंताएं और चिंता का विषय ये है कि धर्म हमें सहिष्णु बनाने के बजाय लगातार असहिष्णु बनता जा रहा है और हम हैं कि उसे न रोक पा रहे हैं और न समझा-बुझा पा रहे हैं असहिष्णुता की आग से ही तालिबानी मानसिकता पनप रही है .दुनिया के दूसरे देशों की समस्या भी यही है ,लेकिन फिलवक्त हमें हमारे देश की चिंता है. हम जब अपने यहां ही हालात नहीं सुधार पा रहे हैं तो कंधार के बारे में कैसे सोच सकते हैं ? हमें कांधार के बारे में नहीं कश्मीर के बारे में सोचना है .हमें सोचना है कि एक सूबे के तीन टुकड़े करने और उससे उसके विशेषाधिकार छीनने के बाद भी वहां खून-खराबा जारी क्यों है ?

मुझे उस समय हैरानी होती है जब सिंघु सीमा पर कत्ल करने वाले लोग अपनी करनी को खुले आम स्वीकार कर लेते हैं लेकिन कश्मीर में हिंसा के लिए ,यूपी,छग,राजस्थान तथा हरियाणा में खून-खराबे के लिए हमारी केंद्र या राज्य सरकारें जिम्मेदारी लेने से कतराती हैं .अब इन सरकारों को राजधर्म कौन समझाए ? हिंसा की हर वारदात देश के लोकतंत्र को कमजोर कर रही है. हिंसा किसी भी राज्य में हो उसे रोकने की जबाबदेही राज्य सरकार की है .आप हिंसा को लेकर ‘ सिलेक्टिव्ह ‘ नहीं हो सकते. ‘सिलेक्टिव्ह ‘ होना केवल सरकारों और सत्तारूढ़ दलों का विशेषाधिकार है. विपक्ष और आम जनता इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती .

घूम-फिर कर सवाल वो ही आता है कि क्या किसी पवित्र ग्रन्थ की बेअदबी की सजा देने का हक क़ानून को है या संगठनों को ?क्या आंदोलन करने वालों को क़ानून के अलावा किसी मंत्री का बेटा सबक सीखा सकता है,क्या कोई तस्कर किसी निरीह भीड़ को रास्ता न देने पर रोंद सकता है ? क्या चंद लोग प्रेम करने वाले युवक को पीट-पीटकर उसकी जान ले सकते हैं ? यदि इन तमाम कथित अपराधों के लिए देश में क़ानून और अदालतें न हों तो मुमकिन है कि जो कुछ हो रहा है उसे जायज कह दिया जाये, किन्तु जिस देश में संविधान है.जाब्ता फौजदारी से लेकर हर छोटे-बड़े अपराध के लिए क़ानून है,सजाएं देने के लिए ग्राम स्तर से लेकर राष्ट्र स्तर तक की अदालतें हैं तो फिर किसी और को सजाएं देने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है ?

लोकतंत्र और राष्ट्र की रक्षा कि लिए गले में भगवा दुपट्टा लटकाने की नहीं बल्कि चौतरफा फन फैला रही हिंसा कि विरोध की आवश्यकता है. यदि आप ये सब कुछ नहीं कर सकते तो आप न लोकतंत्र कि समर्थक हैं और न सच्चे और अच्छे राष्ट्रभक्त .फिर आप केवल मूकदर्शक हैं .और किसानों को रोंदने वाली जीपें किसी भी दिन आपको भी अपना शिकार बना सकती हैं .
@ राकेश अचल

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