उत्तराखंड में एक सप्ताह के भीतर पुरोला से विधायक राजकुमार और कांग्रेस के समर्थन से जीते निर्दलीय विधायक प्रीतम सिंह पंवार बेशक भाजपा में चले गए हों, लेकिन कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी तब बजी जब खबर आई कि कुछ और कांग्रेसी (विधायक या गैर विधायक) भाजपा में जाने का मन बना रहे हैं।
उत्तराखंड के शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व के दिल्ली जाने की पटकथा किशोर उपाध्याय जैसे खांटी कांग्रेसी नेता के भाजपा में जाने की खबर के बाद ही लिखी बताई जा रही है। दरअसल, किशोर उपाध्याय कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से किसी कार्यवश मिले थे। उसके बाद ये चर्चाएं चलने लगी थीं कि उपाध्याय भाजपा में जाने वाले हैं। राज्य में कांग्रेस आलाकमान के ढुलमुल रवैये और गुटबाजी के चलते टिहरी विधानसभा सीट पर उपाध्याय की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है। बस यहीं से कयास लगाने वालों को ये कहने का मौका मिल गया कि किशोर उपाध्याय भाजपा का दामन थामने वाले हैं।
इधर, एक लंबे अरसे से हरीश रावत इशारों ही इशारों में खुद को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की मांग करते आ रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह और हरीश रावत के बीच छत्तीस के आंकड़े की वजह से ये मामला अभी तक टलता रहा है। खबर है कि आलाकमान के सामने अब ये बात भी खुलकर रखी जा सकती है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि चूंकि कांग्रेस के भीतर कोई भी नेता डैमेज की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, लिहाजा देर सवेर दिल्ली आलाकमान को किसी को तो जिम्मेदारी सौंपनी ही होगी।
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के दिल्ली जाने से पूर्व कांग्रेस के धारचूला से विधायक हरीश धामी का यह बयान भी मायने रखता है कि कांग्रेस पार्टी सीएम फेस पर हरीश रावत की घोषणा ना करके गलती कर रही है। धामी ने कहा ठै कि अगर हरीश रावत को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया जाए तो उत्तराखंड में कांग्रेस 2022 में प्रचंड बहुमत की सरकार बनाएगी। लेकिन, पार्टी ऐसा ना करके गलती कर रही है।
बहरहाल, ये तो तय है कि दिल्ली हाईकमान का निर्णय ही अंतिम होगा। लेकिन देखना ये है कि कांग्रेस के भीतर की धड़ेबाजी रुकेगी या नहीं। अगर आलाकमान ऐसा करने में विफल रहता है तो कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में सरकार बना पाना दूर की कौड़ी ही साबित होगा।
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