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प्रसंगवश: केजरीवाल परिघटना का तीसरा संस्करण, ध्रुवीकरण को करारा तमाचा

@ यू. चंदोला 

भाजपा के आधा दर्जन मुख्यमंत्रियों ,तमाम मंत्रियों और डेढ़ सौ से ज्यादा सांसदों को दिल्ली में उतारने के बावजूद भाजपा बुरी तरह चुनाव हार चुकी है । सदमे मे है। दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी भी सदमे में है और अपने एकांत में सुनने योग्य अश्लील भोजपुरी गानों की वीडियो देख रहे हैं । यह सब इसके बावजूद हुआ है कि तमाम तीन तिकड़म तमाम प्रदेशों के नेताओं और तमाम चैनलों अखबारों ने गोदी मीडिया की परंपरा को कायम रखते हुए शाहीन बाग,बिरयानी यानि नफरत ध्रुवीकरण के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया । निस्संदेह इसके लिए सारे दिल्लीवासी बधाई के पात्र हैं।

हालांकि केजरीवाल ने सरकारी स्कूलों के कायाकल्प और मोहल्ला क्लीनिक के जरिए सिद्ध किया की भौतिकवाद भाववाद पर किस प्रकार हावी हो जाता है । रोटी कपड़ा मकान, पैसे के बिना ना तो राम जी का मंदिर बनता है ना अल्लाह का घर । न पुजारी की तनख्वाह निकलती है न ही मौलवी साहब को नोट मिलते हैं । चाहे शंकराचार्य हो, देश के इमामों के राजा महामहिम शाही इमाम साहब हो।

आईआईटी खड़कपुर से इंजीनियरिंग डिग्री धारी और भारतवर्ष में 550 वी रैंक प्राप्त तथा भारतीय राजस्व के भू. पू. अधिकारी अरविंद केजरीवाल को आज पूंजीपति वर्ग ने महानायक के पद पर पुनर्स्थापित किया है । उनके महानायक के दर्जे को चुनौती देने वाले दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंके जाएंगे । बेईज्जती और हिंसा के साथ। चाहे मशहूर वकील प्रशांत भूषण के कद के आदमी हो जिन्होंने भारत के 8 मुख्य न्यायाधीशों को भ्रष्ट कहा था और एक बंद लिफाफा सुप्रीम कोर्ट की अदालत में रखा था । हमारी बुर्जुआ अदालत की हिम्मत नहीं थी कि कोई उस लिफाफे को खोल लेता या उनके खिलाफ मानहानि का केस दर्ज करता । ये हैसियत है शक्तिमान केजरीवाल की।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बारंबार के संकट तो 100 साल से भी पुरानी बात है । परंतु महामंदी की 2008 की घटना के बाद पूंजीपति वर्ग को एक नए चेहरे ,नई पार्टी की आवश्यकता थी । दुनिया से समाजवादी देशों के पराभव के बाद 1990 से दुनिया भर में बचे खुचे कल्याणकारी कदमों से भी पूंजीवादी सरकारों ने कदम पीछे खींचने शुरू कर दिए । उदारीकरण ,निजीकरण की नीति के तहत एनजीओ राजनीति को भरपूर बढ़ावा दिया गया है । यही कारण है कि आज से 32 साल पहले एनजीओ की कठोरतम आलोचना करने वाले सी पी एम के चुनावबाज नेता आज आपने कैडरों के कुकुरमुत्ते की तरह उग आए एनजीओ पर एक सवाल तक नहीं खड़ा करते ।

अमेरिका की गुप्तचर एजेंसी सीआईए फोर्ड फाउंडेशन जैसी साम्राज्यवादी दानदाताओं की संस्थाओं से इसकी फंडिंग की जाती है । इसके माध्यम से भारत में कई दशकों से एनजीओ को पैसा दिया जा रहा है जो सरकारी स्वास्थ्य और सरकारी शिक्षा , रोजगार आदि के क्षेत्र में अपनी जगह बना लेते हैं । इससे सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच जाती है । और समाज में कुछ करने वाले व्यक्तियों को भी समायोजित कर लिया जाता है।इनमे से ईमानदारी से कार्य करने वाले व्यक्तियों में भी आत्म संतोष होता है कि वह समाज के लिए कुछ कर रहे हैं और खुद भी अच्छी खासी गुजर बसर हो जाती है । 2004 में वर्ल्ड सोशल फोरम के आयोजकों में सीपीआई सीपीएम के कैडरों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया गया था । बल्कि उसका आयोजनकर्ता ही ये लोग थे ।

भूतपूर्व एनजीओवादी केजरीवाल टीम से तथा पार्टी को हालिया चुनाव में वामपंथी पार्टियों का समर्थन यूं ही नहीं मिल गया था । यह सब इसके बावजूद था कि दिल्ली में आज भी 40 लाख लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं । वैसे लगे हाथ यह भी बता दिया जाए कि इतनी बड़ी संख्या में मेहनतकशो के होते हुए भी पिछले चुनाव में सीपीआई सीपीएम और सीपीआईएमएल को मिलाकर कुल 10 ,000 वोट भी नहीं मिले । कोई भी कैंडिडेट एक हजार से पार नहीं जा पाया था ।

यह केजरीवाल की वही दिल्ली है जहां हजारों की संख्या में अवैध फैक्ट्रियों है जिनमें दर्जनों अग्निकांड हो चुके हैं, दुर्भाग्य कि होंगे भी । जहां श्रम कानूनों जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है ।जहाँ बीस साल हुए चालीस तथाकथित कम्युनिस्ट सांसद भी रहा करते थे । आखिर केजरीवाल समाजवाद शब्द से यूं ही परहेज नहीं करते हैं । कहते हैं न लेफ्ट ना राइट ।
स्कूल शानदार जरूर है पर झुग्गियों के बच्चे पानी के टैंकर के इंतजार में स्कूल तक नहीं जा पाते हैं । वहां आप के वायदे के हिसाब से न तो पाइप लाइनें बिछाई गई हैं न सीवर लाइन । क्योंकि नगर निगम से लेकर विधायक और एमपी तक कहते हैं कि ये तो अवैध बस्तियां हैं ।

अंत में यह जिक्र यह देखना मजेदार रहेगा कि दिल्ली की जनता को मुफ्त खोरी में के लिए कोसने वाले गोदी मीडिया ने यह सवाल क्यों नहीं उठाया कि केजरीवाल के बिजली, पानी और महिलाओं के यातायात पर तो मात्र ₹2,000 करोड़ सालाना खर्च आता है ।

परंतु मोदी जी तो पिछले सालों में चार लाख करोड़ की विशाल धनराशि मात्र चंद परजीवी पूंजीपति पर लुटा चुके हैं । यह सारा कर्ज बट्टे खाते मे जा चुका है। खैर एक नारे के साथ लेख खत्म । कौन बनाता हिंदुस्तान ,भारत का मजदूर किसान ।

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