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उत्तराखंड में भाजपा कांग्रेस के राजनैतिक हालात पर वरिष्ठ पत्रकार मनीष वर्मा का आकलन

@शब्द दूत ब्यूरो 25 जुलाई 2021)

मनीष वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार 

मनीष वर्मा 

उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर गणेश गोदियाल की ताज़पोशी और प्रीतम सिंह को 6 माह के लिए नेता प्रतिपक्ष बना कर उनकी विदाई करने के बाद भी कांग्रेस का झगड़ा भले ही ख़त्म न हुआ हो, मगर फ़ौरी तौर पर ख़त्म मान लिया गया है. गांधी परिवार ने राजस्थान में ऐसे ही झगड़े के बीज राजस्थान में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बोए थे. अब वो उसी समस्या के बीज पंजाब चुनाव से पहले पंजाब में बो रही है. कीटनाशक डालकर फ़सल उपजाना आसान होता है मगर सेहत के लिए यह फ़ायदेमंद नहीं होता है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान में क़द्दावर नेता थे. तब राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर सचिन पायलट को बैठा दिया गया. यह फ़ैसला किए बिना कि अगर पार्टी जीतती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा?  यही संदेश अब उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी ने मीडिया में दिया है कि मुख्यमंत्री चुनाव के बाद डिसाइड होगा ।राहुल गांधी का यूनाईटेड कलर ऑफ राजस्थान , पंजाब कांग्रेस कमिटी के बाद अब उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी भी कांग्रेस की राजनीति का रंग-रंगीलो उत्तराखंड बन चुका है.  प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जाते जाते प्रीतम सिंह आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं की लहरों पर सवार कर गए है और ऐसे बीज बो गए है की कुछ समय के लिए सब प्रसन्न है पर ये नए अध्यक्ष के बनते ही प्रसन्नता बनी रहेगी या गायब हो जायेगी ये देखना होगा  चार कार्यकारी अध्यक्ष और लंबी चोड़ी लिस्ट से मिली प्रसन्नता  ने कई कांग्रेसियों में इतनी कड़वाहट पैदा कर दी कि उत्तराखंड में  में कांग्रेस बस चल रही है. दौड़ती नही दिखी । बड़े-बड़े वादे कर लोकसभा चुनाव में रैली करके गए गए राहुल गांधी की पांचों सीटों पर हारने के बाद ने उत्तराखंड दुबारा लौटने की भी इच्छा नहीं दिखती . लोकसभा के बाद विधान सभा उप चुनाव एवं पंचायत के साथ नगर निगमों में त्रिवेंद्र सिंह का जलवा बुलंद रहा । जिस तरह का झगड़ा उत्तराखंड में है. उसे देखकर लोग यही कहते हैं कि कांग्रेस के लिए अच्छा होता पांच साल और विपक्ष में बैठ जाती. मगर इस तरह की छीछालेदर तो पार्टी की नहीं होती. कांग्रेस उत्तराखंड में अगर यह साफ़ नहीं करती है कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कौन होगा तो उत्तराखंड में भी पंजाब जैसे हालात बनेंगे.।

यह इतना आसान नहीं है. क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी  राजनैतिक चतुर खिलाड़ी है और वो जानते है कि 13 जिलों में कितना ब्रहामण वोट बैंक है और कितना ठाकुर वोट बैंक  पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के राजनीति करने के तौर तरीक़ों और गणेश गोदियाल में ज़मीन आसमान का अंतर है. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने कभी भी कांग्रेस आलाकमान को वह भाव नहीं दिया जिसकी उम्मीद   इन सबसे गांधी परिवार कर रहा था तभी 4 कार्यकारी अध्यक्ष भी प्रदेश अध्यक्ष के साथ बनाने पड़े यानी की एकता का अभाव था और सबको खुश रखने के लिए बिना गांव का पटवारी बनाया गया यानी 4 कार्यकारी अध्यक्षों के साथ एक अध्यक्ष का सहित 5 बंटवारे टिकटों में तय है ।

मगर यह भी सच है कि शिकस्त खाने के डर की वजह से गांधी परिवार ने भी कभी प्रीतम सिंह ,हरीश रावत ,स्व इंदिरा हृदेश,किशोर उपाध्याय के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने की कोशिश नहीं की. यहीं से उत्तराखंड कांग्रेस में गुटबाजी तेज होती गई सबके मन में ग़लतफहमियां पैदा होती चली गई और जिस तरह की राजनीति हरीश रावत करते हैं उनके अपने काम करने के तरीक़े हैं. वह अपने यहां आम पार्टी , पकौड़ा पार्टी और जलेबी समोसे तलने के साथ भुट्टा सेकते रहे , उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई और  वो उन्हे भूल गए जिन्होंने कभी उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी जी जान लगा दी थी जिन्होंने उन्हें गाड़ी में बैठकर कहा कहा नही घुमाया और बसपा के ईशाम सिंह से लेकर मायावती से लेकर 10 जनपथ में उनकी पैठ बनवई जिसका फायदा उन्हे केंद्रीय मंत्री बनते समय मिला और मुख्य सचिव को होटल में बैठा कर बात करवाई और मुख्यमंत्री बनते ही रणजीत रावत और दो अन्य चेले उनके खास हों गए वो बाकी सब को भूल गए

मुंबई बिल्डर व्यापार से आए और गांव में महिलाओं के समूह को जोडकर गाय खरीदी और महिलाओं के समूह को दी और दुध डेरी से विधायक तक का सफर और विधायक से अध्यक्ष प्रदेश कांग्रेस ……गणेश गोदियाल को सब काम करने में शेर समझते थे. वह शेर-ए-उत्तराखंड निकले. हरीश रावत और किशोर के ज़्यादातर समर्थक चुपचाप गोदियाल के साथ चले गए और किशोर प्रीतम और हरीश रावत को कानों कान ख़बर नहीं लगी. उसी तरह से जैसे कमलनाथ के विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ चले गए और कमलनाथ को ख़बर तक नहीं लगी.  अब पंजाब को देखते हुए लोग कहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने अमरिंदर सिंह के साथ ज़बरदस्ती की है ।

लेकिन यह सच है कि कांग्रेस आला कमान ने फूंक-फूंक कर क़दम रखा है और हर क़दम पर उन्हें रिपोर्ट मिली कि हरीश रावत के पास विधायकों का बड़ा अभाव है और पिछले चुनावों में दोनो सीटी पर हारने की वजह और र्स्टिग ऑपरेशन के चलते कम जनाधार है इसलिए हाईकमान ने हरीश रावत को पंजाब में व्यस्त कर यहां सारा खेल कर लिया  मगर इससे उलट प्रीतम सिंह  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमितशाह की तरह 24 घंटे की राजनीति करते हैं. वह जब प्रदेश अध्यक्ष बने थे तब से आलाकमान के लोग यह समझ गए थे कि जिसके पास विधायक है कांग्रेस आलाकमान चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता है इसलिए उन्हे कुछ समय के लिए नेता प्रतिपक्ष बना कर प्रदेश कांग्रेस से उनकी विदाई कर दी गई 

लिहाज़ा वह शुरू से विधायकों को सेट रखने में कांग्रेस हाई कमान अपना पूरा ध्यान लगा रहा हैं. अपनी सरकार बनाने के लिए वह और भी चौकन्ने हो गए है 

बुद्धिमान लोग कहते हैं कि महान वह नहीं बनता जो केवल अपनी गलतियों से सीखता है बल्कि महान वह बनता है जो दूसरों की गलतियों से भी सीखता है शायद हरीश रावत को भी अब यही सोचना होगा और जैसे भी हो कांग्रेस हाईकमान के ही आदेश का पालन करना होगा उनकी ऐसी स्थिति नही है कि वो कांग्रेस हाईकमान के विरोध में जाए ।

फिलहाल इतना ही …अगली खबर होगी भाजपा का साढ़े चार साल का मूल्यांकन और क्या गलती और क्या रही उपलब्धि और कैसे होगी नैया पार ….

साथ ही आंकलन होगा ….. दायित्व धारियों ने 4 साल क्या कार्य किया और कितना खजाना खाली किया

और कौन है आस्तीन के सांप ?

झुक कर उठ जाना ही आगे बदने जाने की कला है...कैसे होगा चुनाव का सोशल इंजीनियरिंग का मैनेजमेंट बुलाएंगे बाहरी दिग्गजों को करोड़ों देकर या बीच के साथियों को चुनेंगे ?

 और भाजपा के किस पुराने जादूगर के पास कई सारे नए खेल अभी बचे हुए हैं.  कटी हुए गर्दनों को जोड़ना दुनिया के किसी डाक्टर के बस में नहीं यह तो बस जादू के खेल में जादूगर हीं दिखता है…..

(लेखक वॉयस आफ नेशन के संपादक व वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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