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साहित्य गंगा :धारावाहिक कहानी “मुआवजा, सिस्टम पर चोट करती आम आदमी की दास्तां, पहली किश्त

धारावाहिक कहानी

                    मुआवजा

        मंगलू ने रिक्शा खड़ा किया और अपने कुर्ते की बांह से पसीना पोंछा। एक कमरे के टूटे और गिरताऊ मकान की ओर देखा और अपनी मजदूरी की कमाई को ध्यान में रखकर उसने एक लंबी सांस ली। कुछ और सोचता कि उसकी बेटी चिन्नी घुटनों के बल चलती हुई दरवाजे की दहलीज लांघने की कोशिश करते हुए पिता की ओर निहारने लगी।

बेटी पर नजर पड़ते ही मंगलू अपनी सारी थकावट भूल गया। जल्दी से बेटी को अपनी बांहों में समेटकर वह निहाल हो उठा। ये रोज का क्रम था उसका।

अपने तीन लोगों के छोटे से परिवार में मंगलू अपनी मुफलिसी के बावजूद खुशी के पलों को तलाश लेता था। इस बीच पत्नी लाजो ने भी पति की रिक्शा की आवाज सुन ली थी। वैसे भी चिन्नी की किलकारी से उसे पता चल जाता था कि मंगलू लौट आया है।

रोज़ की तरह लाजो ने प्लास्टिक की बाल्टी से शीशे का गिलास भर मंगलू की ओर बढ़ा दिया। बेटी के साथ खेलते और पानी पीते मंगलू को लाजो सवाल भरी नजर से देख रही थी। मंगलू ने बिना कहे लाजो का सवाल समझ लिया था और जबाब में ना में सिर हिला दिया।

अचानक लाजो फट पड़ी। “देखो, मैं कहती न थी। ये नेता सिर्फ वोट मांगने ही आते हैं। ये कभी किसी को कुछ देते नहीं।”

मंगलू ने पानी पीकर गिलास नीचे रखा और बोला “लाजो, तू समझती नहीं। विधायक जी, कित्ते बड़े आदमी हैं। अर्जी तो दे दी है। टाइप वाले की दुकान में जाकर लिखवाई। तीस रुपये लिये उसने। दो सवारी के पैसे तो अर्जी टाइप कराने में चले गए। फिर विधायक जी के आफिस में जाकर जमा करा दी है।”

यह सब कहते हुए मंगलू ने मकान की छत से झड़ रहे प्लास्टर की ओर देखा। बोला “एक लाख रुपये की मदद दिलवाने के लिए लिखा है कि सरकार तक पहुंचा दें। मकान की मरम्मत के लिये। विधायक जी का जो आदमी बैठा था। वो तो कै रिया था अर्जी सरकार तक पहुंच जायेगी विधायक जी पहुंचा देंगे।”

मंगलू की यह बात सुनकर लाजो के चेहरे पर चमक सी आ गई। चिन्नी को उसके हाथ से लेते हुए बोली ” चलो, हाथ-मुंह धो लो। चाय चढ़ा देती हूं। तुम जाकर जरा दुकान से बिस्कुट का पैकेट ले आओ। चिन्नी सुबह से मचल रही है बिस्कुट खाने के लिए।”

रात भर मंगलू सोचता रहा। कल विधायक जी से मिलेगा और वो उसकी अर्जी पर अपनी चिड़िया बिठाकर सरकार को भेज देंगे। छत गिरने का डर भी दूर हो जायेगा। वरना जब भी बारिश होती तो पूरी रात आंखों में कटती है। कहीं छत गिर गयी तो….।

उस दिन बाजार में एक सवारी उसकी रिक्शा में बैठी थी। उसके पास किसी का फोन आया था। फोन पर कोई बता रहा था कि किसी के घर की छत गिरने से मां बेटी की मौत हो गई। जिस पर सरकार ने दो-दो लाख का मुआवजा दिया। सवारी की फोन पर बातचीत सुनकर मंगलू सरकार की मन ही मन तारीफ करता रहा। कितनी अच्छी सरकार है? यही सब सोचते-सोचते मंगलू की आंख कब लग गई पता ही नहीं चला।

सुबह जब उठा तो फटाफट तैयार हुआ। पत्नी लाजो ने रोज की तरह चाय दी और पूछा “आज तो पैसे मिल जायेंगे न।”

मंगलू को पहले तो गुस्सा आया लेकिन फिर सवाल के पीछे पत्नी की बेबसी और चिंता को उसने महसूस किया। हंसते हुये बोला, “हां, हमारे तांई धर रखे है रूपया, विधायक जी ने । इधर मैं पहुंचोंगो तो पोटली थमा देंगें मोको।”

लाजो एकटक पति का मुख देखती रही। अपनी तोतली आवाज में बा,.. बा… कहती हुई चिन्नी बाप के पास आ गयी। दरअसल रोज का नियम था मंगलू रिक्शा पर अपनी बेटी को सबसे पहले सुबह बिठाकर एक चक्कर लगाता था।

मंगलू कहता था, “लाजो, हमारी चुन्नो जाय दिन रिक्शा पर नाहि बैठती तो बोहनी भी बड़ी मुश्किल से होवे। मैं तो सबसे पहले अपनी चुन्नो को सवारी बना के बैठाऊ। लक्ष्मी जी है हमार चिन्नी तो।”

चिन्नी लाजो और मंगलू तीन लोगों का यह छोटा सा परिवार एक छोटे से मकान में मुफलिसी के साथ जी तोड़ मेहनत कर खुश रहने की पूरी कोशिश कर रहा था।….. 

जारी…

 

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