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ब्रिटिश वास्तुकला की अद्भुत विरासत है नैनीताल का राजभवन

@शब्द दूत ब्यूरो (14 अगस्त, 2021)

नैनीताल में ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में मौजूद गौथिक वास्तुकला पर आधारित बेहद खूबसूरत प्राकृतिक परिवेश, चारों ओर हरियाली, शांत वादियों और ठंडी आबोहवा के बीच साक्षात प्रकृति की होड़ में बना नैनीताल का राजभवन देश के सर्वश्रेष्ठ राजभवनों में शामिल है। वहीं अपने उत्तर भारत के श्रेष्ठतम और खूबसूरत गोल्फ कोर्स और जैव विविधता के चलते भी देश के दर्शनीय स्थानों में प्रमुख है।

भारत के इतिहास की तमाम प्रमुख घटनाओं के गवाह रहे समुद्र सतह से 6,785 फीट ऊंचाई पर स्थित इस राजभवन की नींव 27 अप्रैल 1897 को रखी गई थी और मार्च 1900 में यह बनकर तैयार हुआ था। ब्रिटिश शासकों की पसंदीदा गौथिक शैली में निर्मित इस भवन का आकार अंग्रेजी के ई शब्द जैसा है।

बड़ी-बड़ी गुम्बदनुमा आकृतियां, तीखी ढलान वाली छतें और चौड़ी घुमावदार सीढियां इस शैली की प्रमुख विशेषताएं हैं। मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनल, वीटी (अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) की रूपरेखा बनाने वाले वास्तुकार फ्रेडरिक विलियम स्टीवन ने ही इस राजभवन का डिजायन भी तैयार किया था।

इस भवन के निर्माण में नार्थ वेस्ट प्रोविंस के गवर्नर सर एंटोनी पैट्रिक मैकडॉनल और लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता एफओ ऑएरटेल की भी विशेष भूमिका रही। इसके निर्माण के बाद मैकडॉनल ही इस राजभवन में रहने वाले पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर भी बने।

राजभवन के निर्माण में मिस्त्री पंजाब के रमगढ़िया सिख समुदाय के थे। उन्होंने इसके परिसर में एक गुरुद्वारा भी बनाया था जो नैनीताल का पहला गुरुद्वारा था। बाद में इसे अन्यत्र स्थापित किया गया। राजभवन में पत्थर का काम आगरा के और रंग-रोगन स्थानीय कारीगरों ने किया। इसकी साज-सज्जा का काम लंदन की मैसर्स ‘मेपल एंड कम्पनी’ और कोलकाता की मैसर्सस ‘लैजर्स एंड कम्पनी’ ने किया।

निर्माण सामग्री के लिए स्थानीय पत्थर प्रयुक्त किये गए, इंग्लैंड से शीशे और टाइल व कुछ लाल पत्थर आगरा से मंगवाए गए थे। इसके बरामदे और सीढ़ियों में मिर्जापुर से लाये गए पत्थरों का उपयोग किया गया। इसकी छत में रेवाड़ी स्लेट और सीढ़ियों व भोजन कक्ष की उल्टी छत में टीक की लकड़ी का उपयोग किया गया, जबकि कार्ड रूम की ऊपरी छत कश्मीर की लकड़ी से बनाई गई।

राजभवन के विभिन्न दरवाजों, खिड़कियों, बे विंडो, फर्नीचर आदि में शीशम, साटिन, साईप्रस और साल की लकड़ी का प्रयोग किया गया। इसके लिए पीतल और लोहे के नल इंग्लैंड से मंगवाए गए। सजावट के लिए कालीन फतेहपुर, आगरा और लखनऊ से मंगाए गए। इसकी दीवारों पर हाथी दांत लगाए गए। यूरोप से लाकर विभिन्न प्रजातियों के पेड़ भी यहां लगाए गए। तब इसके निर्माण में साढ़े सात लाख रुपए की लागत आई थी।

राजभवन में दुर्लभ और बेहद आकर्षक एंटीक फर्नीचर के साथ ही संग्रहालय में सुल्ताना डाकू के हथियार, भाले, तलवार आदि और पुराने समय के बर्तन लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

   

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