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उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का प्रभाव और कांग्रेस की आंतरिक चुनौती, परायों और अपनों के निशाने पर एक राजनेता

@विनोद भगत

उत्तराखंड की राजनीति पिछले दो दशकों में कई उतार-चढ़ाव से गुज़री है, लेकिन एक नाम लगातार केंद्र में बना रहा—हरीश रावत। चाहे सत्ता में कांग्रेस रही हो या भाजपा, राज्य की राजनीतिक धुरी लंबे समय तक हरीश रावत के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यही कारण है कि आज भी प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बना हुआ है।

भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दलों की रणनीति में हरीश रावत एक अहम कारक बन गए हैं। भारतीय जनता पार्टी लगातार उन्हें मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे मुद्दों पर घेरती रही है। कभी कथित “जुम्मे की छुट्टी” जैसे विवादों को हवा दी जाती है, तो कभी उन्हें सनातन विरोधी बताकर राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश होती है। भाजपा के लिए हरीश रावत एक ऐसा चेहरा हैं, जिनके खिलाफ बयानबाजी कर वह कांग्रेस को निशाने पर लेती है और अपने समर्थक वर्ग को एकजुट करती है।

दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भी स्थिति कुछ कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। पार्टी के कई वरिष्ठ और महत्वाकांक्षी नेता समय-समय पर हरीश रावत के नेतृत्व को खुली या छिपी चुनौती देते रहे हैं। नेतृत्व की यह खींचतान कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरी है। जहां एक ओर पार्टी को एक मजबूत और सर्वमान्य चेहरे की जरूरत है, वहीं आंतरिक गुटबाजी उसे लगातार कमजोर कर रही है।

उत्तराखंड में कांग्रेस की सत्ता से दूरी का एक बड़ा कारण यही नेतृत्व संकट है। पार्टी के भीतर एकजुटता का अभाव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की टकराहट ने संगठन को जमीनी स्तर पर कमजोर किया है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के नेता स्वयं ही पार्टी के हितों से अधिक अपने राजनीतिक भविष्य को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है, जो संगठित होकर चुनावी मैदान में उतरती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को उत्तराखंड में पुनः सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे आंतरिक मतभेदों को भुलाकर एकजुट होना होगा। साथ ही, एक स्पष्ट और सर्वमान्य नेतृत्व स्थापित करना होगा, जो न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं बल्कि आम जनता के बीच भी विश्वास पैदा कर सके।

अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत एक केंद्रीय किरदार रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के भविष्य का निर्धारण केवल एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व और संगठनात्मक मजबूती पर निर्भर करेगा। जब तक पार्टी इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करती, तब तक सत्ता की राह उसके लिए कठिन बनी रहेगी।

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