@शब्द दूत ब्यूरो (17 जनवरी 2026)
काशीपुर । पैगा गांव निवासी किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का मामला अब केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुका है। इस बहुचर्चित कांड में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे यह आरोप भी तेज हो रहे हैं कि ऊधमसिंहनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) मणिकांत मिश्रा को जांच के दायरे से बाहर रखने की कोशिशें की जा रही हैं।
10 जनवरी 2026 को हल्द्वानी के एक होटल में सुखवंत सिंह ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। इससे पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर जमीन धोखाधड़ी, पुलिस की लापरवाही और दबाव के गंभीर आरोप लगाए थे। वीडियो में सुखवंत सिंह ने यह भी कहा था कि उन्होंने कई बार पुलिस अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
मृतक के परिजनों की तहरीर पर काशीपुर कोतवाली में 26 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इसके बाद निचले स्तर के पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करते हुए दो दरोगाओं को निलंबित किया गया और 12 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर व स्थानांतरित कर दिया गया।
हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि जब पूरा मामला जिले में लंबे समय से चला आ रहा था। जब पीड़ित लगातार पुलिस अधिकारियों के संपर्क में था। और जब आरोप सीधे पुलिस तंत्र पर हैं। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि जिले के मुखिया एसएसपी मणिकांत मिश्रा की भूमिका की जांच क्यों नहीं की जा रही?
विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले में खुलकर आरोप लगाया है कि “पुलिस केवल बलि के बकरे ढूंढ रही है, असली जिम्मेदारों को बचाया जा रहा है।”
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने देहरादून में डीजीपी कार्यालय पर धरना देते हुए कहा कि एसएसपी मणिकांत मिश्रा की भूमिका की निष्पक्ष जांच किए बिना न्याय संभव नहीं है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जिले में वर्षों से जमीन विवाद चल रहे थे। पीड़ित ने पुलिस को लिखित और मौखिक शिकायतें दीं। इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई
ऐसे में जवाबदेही तय करने से बचना पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े करता है।
सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच टीम (SIT) का गठन जरूर किया है, लेकिन विपक्षी दल कांग्रेस पीड़ित का कहना है कि “अगर जांच पुलिस विभाग के ही अधिकारियों द्वारा होगी, तो क्या एसएसपी जैसे वरिष्ठ अधिकारी तक जांच पहुंचेगी?” यही वजह है कि CBI जांच की मांग तेज होती जा रही है।
उधर नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा आरोपितों की गिरफ्तारी पर रोक लगाए जाने के बाद यह मामला और संवेदनशील हो गया है। जानकारों का कहना है कि यदि जांच सही दिशा में नहीं गई, तो यह केस केवल फाइलों में उलझकर रह जाएगा।
सुखवंत सिंह के परिजन लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि
“अगर एक किसान की मौत के बाद भी जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी से सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तो आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा?” हालांकि बीच में कुछ वीडियो विरोधाभासी भी इस मामले में नजर आये। जिनसे मामला और पेचीदा हो गया है। वीडियोज को लेकर मृतक के भाई परविंदर सिंह का कहना है कि उनकी गैर मौजूदगी में पुलिस द्वारा दबाव डालकर वीडियो बनवाये गये। यह अपने आप में काफी संवेदनशील मामला बन गया है।
अगर यह कहा जाये कि सुखवंत सिंह आत्महत्या कांड अब पुलिस सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी बन चुका है। निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई के बाद भी
एसएसपी मणिकांत मिश्रा की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होना इस मामले में कई सवाल खड़े करता है।
इस पूरे मामले को राजनीतिक और सामाजिक विस्फोट की ओर ले जा सकता है। अब देखना यह है कि जांच सच तक पहुंचती है या एक किसान की मौत की सच्चाई भी सिस्टम की फाइलों में दफन हो जाती है।
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