Breaking News

जनजाति आरक्षित चकराता में मतदाता सूची पर सवाल: नेपाली मूल और मुस्लिम वन गुर्जरों के नाम सामने आने से उठा विवाद, नेपाल व उत्तराखंड की जातियों के उपनाम की समानता से स्थिति हुई जटिल

@शब्द दूत ब्यूरो (09 जनवरी 2026)

देहरादून। उत्तराखंड में फरवरी से शुरू होने जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से पहले मतदाता सूची को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। राज्यभर में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) सर्वे कर रहे हैं, जिसमें ऐसे मतदाताओं की पहचान की जा रही है जिनके नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में दर्ज पाए गए हैं। इसी प्रक्रिया के दौरान जनजाति आरक्षित विधानसभा क्षेत्र चकराता की मतदाता सूची को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में चकराता जनजाति रिजर्व सीट पर बड़ी संख्या में मुस्लिम वन गुर्जरों और नेपाली मूल के लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज पाए गए हैं। इसको लेकर जौनसारी बावर क्षेत्र के स्थानीय लोगों में आक्रोश देखा जा रहा है और पूरे मामले की व्यापक जांच की मांग की जा रही है।

बताया जा रहा है कि चकराता ही नहीं, बल्कि आसपास की अन्य विधानसभा क्षेत्रों की वोटर लिस्ट में भी नेपाली मूल के लोगों के नाम दर्ज हैं। खास बात यह है कि नेपाल और उत्तराखंड की कई जातियों के उपनाम समान हैं, जैसे कार्की, जोशी, सामंत, भट्ट, देउपा आदि, जिससे पहचान और सत्यापन को लेकर स्थिति और जटिल हो गई है।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, चकराता क्षेत्र में पावर प्रोजेक्ट्स और वन विभाग से जुड़े कार्यों के चलते बड़ी संख्या में नेपाली श्रमिक यहां आकर बस गए। आरोप है कि कुछ ठेकेदारों ने उनके आधार कार्ड बनवाए और बाद में उनके नाम मतदाता सूची में भी दर्ज करा दिए।

जिन गांवों में नेपाली मूल के मतदाताओं के नाम सामने आए हैं, उनमें चात्रा, हनोल, कथियान, कोटी कनासर, मशक, चौंसाल, बिरनाड़, बास्तील और ओबरासेर शामिल बताए जा रहे हैं। इन सभी मामलों की जांच चल रही है।

इसके अलावा त्यूणी क्षेत्र में नेपाली श्रमिकों की संख्या लगभग 1400 बताई जा रही है। वहीं त्यूणी की मतदाता सूची में दो हजार से अधिक मुस्लिम वन गुर्जरों के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है, जिन्हें खानाबदोश बताया जा रहा है।

स्थानीय जौनसारी जनजाति के लोगों का कहना है कि चकराता और त्यूणी जनजाति आरक्षित क्षेत्र हैं, जहां बाहरी लोगों का बसना और भूमि खरीदना कानूनन प्रतिबंधित है। उनका आरोप है कि वन गुर्जर सरकारी वन भूमि पर अवैध कब्जा कर रहे हैं और जनजातीय अधिकारों पर दावा कर रहे हैं, जिससे स्थानीय समुदाय का अस्तित्व संकट में पड़ रहा है।

त्यूणी हिमाचल प्रदेश से सटा एक संवेदनशील क्षेत्र भी है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि जब हिमाचल में भू-कानून सख्त हैं और बाहरी लोगों को जमीन खरीदने की अनुमति नहीं है, तो उत्तराखंड के जनजाति क्षेत्रों में ऐसी गतिविधियों को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है।

रुद्र सेना के संयोजक राकेश तोमर उत्तराखंडी का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण और वन विभाग की लापरवाह नीतियों के चलते जौनसारी जनजाति का वजूद खतरे में है। उन्होंने मांग की है कि बाहरी लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएं और वे वहीं वोट डालें, जहां के वे मूल निवासी हैं।

अब मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान यह देखना अहम होगा कि प्रशासन इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है और जांच के बाद कौन से तथ्य सामने आते हैं।

Website Design By Mytesta +91 8809666000

Check Also

काशीपुर :उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी के पिता हरिशंकर शर्मा का निधन, शोक की लहर

🔊 Listen to this @शब्द दूत ब्यूरो (21 जनवरी 2026) काशीपुर। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी रवि …

googlesyndication.com/ I).push({ google_ad_client: "pub-