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प्रतीकात्मक चित्र

भारत-पाक मैच : खेल या राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न?आतंक के जख्मों के रिसते घावों के बीच

@शब्द दूत ब्यूरो (14 सितंबर 2025)

भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच का जिक्र होते ही करोड़ों दर्शकों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। खेल के लिहाज़ से यह सिर्फ एक मुकाबला है, लेकिन असलियत यह है कि यह 22 गज की पिच पर नहीं, बल्कि इतिहास और राजनीति के बोझ तले खेला जाता है। आज जब देश के भीतर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से मासूमों का खून बह रहा है, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है—क्या हमें पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना चाहिए?

पहलगाम में हालिया आतंकी हमला और उसके बाद शहीद हुए निर्दोष पर्यटक हमें याद दिलाते हैं कि पाकिस्तान के साथ रिश्ते किसी सामान्य पड़ोसी जैसे नहीं हैं। भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर आतंकियों को जवाब दिया, सिंधु जल संधि पर रोक लगाकर कड़ा संदेश दिया। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के साथ मैदान साझा करना न सिर्फ विरोधाभासी दिखता है बल्कि शहादत का अपमान भी प्रतीत होता है।

यह कोई पहली बार नहीं है। 1947 से लेकर कारगिल तक, उरी से पुलवामा तक—हर बार पाकिस्तान की ओर से आया आतंक भारत की संवेदनाओं को छलनी करता रहा है। और हर बार जब क्रिकेट का कोई टूर्नामेंट सामने आता है, तो यह पुराना ज़ख्म ताज़ा हो जाता है। द्विपक्षीय क्रिकेट वर्षों से बंद है, फिर भी बहुपक्षीय प्रतियोगिताओं में यह मुकाबला जबरन ठेल दिया जाता है।

समर्थकों का तर्क है कि खेल को राजनीति से अलग रखना चाहिए, क्रिकेट कूटनीति का जरिया हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या खेल का मंच तब भी तटस्थ रह सकता है जब सीमा पर जवान शहीद हो रहे हों? क्या क्रिकेट की गेंद और बल्ला उस खून से बड़ा है जो आतंक के हाथों बहाया गया?

सच तो यह है कि भारत-पाक मुकाबला अब सिर्फ खेल नहीं रह गया है। यह राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल है, शहादत और संवेदना का सवाल है। इस मैच पर विरोध महज़ खेल के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ है जो “सामान्य रिश्तों” का आभास देकर पाकिस्तान को वैधता देती है।

शायद यही वह समय है जब हमें तय करना होगा कि क्रिकेट को खेल की तरह देखा जाए, या फिर इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान के तराजू पर तौला जाए। क्योंकि पिच पर खेला जाने वाला यह खेल अब दिलों और ज़ख्मों की पिच पर उतर चुका है।

 

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