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नदियों को साफ मत करो, पेड़ काटकर जगह को साफ करो, आपदा को “प्राकृतिक” कह कर “अवसर” ढूंढो, एक दिन तुम्हें नदियां और पेड़ साफ कर देंगे

@विनोद भगत

तुम नदी को साफ मत करो। पेड़ काटकर जगह को साफ करो। देखना, एक दिन यही नदी तुम्हें साफ कर देगी। यह वाक्य केवल एक चेतावनी नहीं है, बल्कि उस अनदेखे संकट की पूर्वसूचना है जिसे हम अपनी आँखों के सामने आकार लेते देख रहे हैं, लेकिन उसे “प्राकृतिक आपदा” कहकर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।

हमने विकास को केवल कंक्रीट, लोहे और डामर से जोड़ दिया है। आजकल ‘साफ-सफाई’ का अर्थ है – पेड़ काट देना, जमीन समतल कर देना, नदी के किनारों को सीमेंट से बाँध देना और जंगलों को उजाड़ कर टाउनशिप बना देना। हमें लगता है कि इससे हम आधुनिक हो रहे हैं। लेकिन जो पेड़ काटे जा रहे हैं, वो सिर्फ हरियाली नहीं खो रहे – वो मिट्टी को थामने की ताकत, पानी को सोखने की क्षमता और मौसम को संतुलित करने की भूमिका भी खो रहे हैं।

पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन के स्रोत नहीं हैं, वे नमी बनाए रखते हैं, धरती को धूप से बचाते हैं और बाढ़ की मार से इंसान और जानवर दोनों की रक्षा करते हैं। पर जब इन्हें बेरहमी से काटा जाता है, तो बारिश का पानी सीधे नदियों में बह जाता है, नदी उफान पर आ जाती है, और फिर वही नदी गाँव, शहर, खेत, सड़क, सब कुछ अपने साथ बहा ले जाती है।

आज देश के कई इलाकों में जो बाढ़, भूस्खलन, जलजमाव और मौसम की विकृति देखी जा रही है, वह सिर्फ ‘प्राकृतिक आपदा’ नहीं है – वह हमारी लालच और लापरवाही का परिणाम है। जलवायु परिवर्तन केवल किताबों और सम्मेलनों की बात नहीं रह गया, वह हमारे दरवाजे पर खड़ा है, और भीतर घुसकर तबाही मचा रहा है।

जिन परियोजनाओं के लिए जंगल काटे जा रहे हैं – जैसे सड़कों का चौड़ीकरण, जलविद्युत परियोजनाएँ, टाउनशिप निर्माण – वे सभी स्थानीय पारिस्थितिकी की जड़ों को खोखला कर रही हैं। हिमालय क्षेत्र इसका सबसे ताजा उदाहरण है। वहाँ सुरंगें बन रही हैं, पर्वतों में विस्फोट हो रहे हैं, पेड़ कट रहे हैं और नदियाँ बाँधी जा रही हैं। इसका नतीजा है – हर साल मानसून में मौत की बारिश, गाँवों का अस्तित्व मिट जाना और लाखों लोगों का विस्थापन।

और जब ऐसी त्रासदी आती है, तो हम उसे ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन क्या सचमुच यह प्रकृति की भूल है? या फिर यह मनुष्य की बनाई हुई आपदा है?

वास्तविकता यह है कि हम स्वयं अपने लिए खाई खोद रहे हैं। हम जो कुल्हाड़ी पेड़ों पर चला रहे हैं, वह दरअसल हमारे ही पैरों को काट रही है। यह कुल्हाड़ी हमारी हवा को विषैला बना रही है, हमारे जलस्रोतों को सूखा रही है, और हमारी धरती को बंजर कर रही है।

यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ शुद्ध हवा में साँस ले सकें, साफ पानी पी सकें और सुरक्षित घरों में रह सकें – तो हमें अब दिशा बदलनी होगी। हमें विकास के नए मानदंड तय करने होंगे, जिसमें प्रकृति के साथ तालमेल हो।

हमें समझना होगा कि असली ‘साफ-सफाई’ नदियों को सीमेंट से बाँधना नहीं, बल्कि उन्हें उनके प्राकृतिक मार्ग में बहने देना है। असली विकास पेड़ों को काटकर नहीं, उन्हें बचाकर होगा।

यदि आज नहीं चेते, तो कल बहुत देर हो जाएगी। वह दिन दूर नहीं जब यही नदी, जो आज शांत प्रतीत होती है, तुम्हें इस धरती से “साफ” कर देगी – और फिर तुम केवल इतिहास के पन्नों में रह जाओगे – विनाश के प्रतीक बनकर।

अब भी समय है – कुल्हाड़ी वापस रख दो, वृक्षों को जीने दो, ताकि हम भी जी सकें।

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