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क्या अधिवक्ताओं को बैंक ऋण नहीं देते? एक सच्चाई से रूबरू कराता विस्तृत विश्लेषण

@विनोद भगत

🔍 अधिवक्ताओं को ऋण देने में बैंकों की हिचक – एक यथार्थ

कई वकीलों और नवप्रवेशी अधिवक्ताओं ने यह अनुभव साझा किया है कि जब वे बैंकों से ऋण लेने जाते हैं – चाहे वह पर्सनल लोन या होम लोन व कार लोन – तो उन्हें एक आम जवाब मिलता है:
“आपकी आय निश्चित नहीं है।”

यह बात काफी हद तक सत्य भी है कि अधिवक्ता पेशे में प्रारंभिक वर्षों में आय बहुत अनिश्चित होती है। बैंक, जो सैलरी स्लिप, फॉर्म 16 या ITR के आधार पर ऋण देते हैं, अधिवक्ताओं के पास अक्सर ऐसी स्थिर और नियमित आय का कोई दस्तावेज नहीं होता।

💼 बैंकिंग तंत्र की सोच: स्थिरता बनाम स्वायत्तता

बैंक मुख्यतः दो प्रकार के आय स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं:

  • नौकरीपेशा (Salaried Class) – जिनकी मासिक आय स्थिर होती है।
  • व्यवसायी (Business Class) – जिनके पास व्यापार रजिस्ट्रेशन, जीएसटी रिटर्न, आय कर विवरण आदि होते हैं।

 वे अधिवक्ता न तो पूरी तरह व्यवसायी माने जाते हैं और न ही नौकरीपेशा एक स्वतंत्र पेशेवर होते हैं जिनकी आमदनी उनके अनुभव, क्षेत्र, अदालतों में अभ्यास और संपर्कों पर निर्भर करती है।

⚖️ अधिवक्ता वर्ग का पक्ष – क्या यह उचित है?

वकीलों का यह कहना बिल्कुल सही है कि बैंकों का यह रवैया उनकी मेहनत और सामाजिक प्रतिष्ठा का अनादर है। एक वकील को न्यायपालिका का अंग माना जाता है। ऐसे में जब उसे सिर्फ इस कारण ऋण न दिया जाए कि उसकी आमदनी का कोई “फिक्स प्रूफ” नहीं है, तो यह व्यवस्था की खामी को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त:

  • अधिवक्ता आयकर रिटर्न भरते हैं।
  • उनकी कई बार नियमित प्रैक्टिस होती है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ताओं की आमदनी लाखों में होती है।
  • बार काउंसिल में उनका पंजीकरण उनके पेशे की प्रमाणिकता दर्शाता है।

🔧 कुछ संभावनाएं: समाधान क्या हो सकता है?

  1. प्रोफेशनल कैटेगरी में अधिवक्ताओं को शामिल किया जाए: डॉक्टर, सीए, इंजीनियर की तरह अधिवक्ताओं को भी प्रोफेशनल कैटेगरी में शामिल किया जाए।
  2. बार काउंसिल का समर्थन पत्र: यदि बार काउंसिल वकील की प्रैक्टिस प्रमाणित करे, तो बैंक उस आधार पर ऋण मंजूर कर सकते हैं।
  3. स्पेशल प्रॉफेशनल लोन स्कीम जैसी स्कीम लाई जाए, जिससे ऋण की सुविधा सुलभ हो सके।
युवा अधिवक्ता अभिताभ सक्सैना

विजय माल्या जैसे भगोड़ों को लोन मिल सकता है इस देश में लेकिन अपने स्वावलंबी स्वभाव के चलते वकालत जैसा पेशा चुनने वाले मेहनतकश अधिवक्ताओं को लोन देने से सभी बैंक्स को परहेज है !

विडंबना ये है कि लोन देने के लिए भी इन्हें अधिवक्ताओं की रिपोर्ट की आवश्यकता होती है ,कोई लोन ना चुकाए तो रिकवरी के लिए भी अधिवक्ता की जरूरत होती है लेकिन अधिवक्ताओं के लिए लोन किसी के पास नहीं है। 

 

📝 निष्कर्ष

अधिवक्ता न केवल समाज का प्रहरी होता है, बल्कि वह संवैधानिक व्यवस्था की रीढ़ भी है। यदि बैंक उन्हें सिर्फ इसलिए ऋण न दें कि उनकी आय स्थिर नहीं है, तो यह एक सामाजिक-आर्थिक अन्याय है।

यह आवश्यक है कि बैंकिंग नीति में “व्यावसायिक सम्मान” और “पेशे की प्रकृति” को ध्यान में रखते हुए अधिवक्ताओं के लिए विशेष ऋण नीति लागू की जाए। हालांकि बैंक नियमावली में ऐसा कहीं नहीं है कि अधिवक्ताओं को ऋण नहीं दिया जाये।

📌 यदि आप भी एक अधिवक्ता हैं और आपको बैंक से ऋण लेने में कठिनाई हुई है, तो यह लेख आपके अनुभव को स्वर देता है। इसे साझा करें और इस मुद्दे पर एक जनचेतना बनाएं।

 

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