@विनोद भगत
आज के डिजिटल युग में जब सूचना की गति प्रकाश की रफ्तार से भी तेज़ हो गई है, तब यह अपेक्षा करना स्वाभाविक हो गया है कि व्यक्ति तथ्य आधारित, प्रमाणिक और विवेकपूर्ण व्यवहार करे। परन्तु विडंबना यह है कि जैसे-जैसे तकनीक सहज और सुलभ होती जा रही है, वैसे-वैसे उसका प्रयोग करने वालों की बौद्धिक जिम्मेदारी घटती जा रही है। विशेषकर व्हाट्सएप जैसे मंचों पर वीडियो फारवर्ड करने की प्रवृत्ति इस कदर बढ़ गई है कि बिना सोचे-समझे, बिना जांचे-परखे लोग किसी भी दृश्य को आंख मूंदकर आगे बढ़ा देते हैं।
आजकल एक आम दृश्य है — कोई वीडियो आता है जिसमें किसी ऐतिहासिक घटना का विकृत चित्रण होता है, किसी धर्म या संप्रदाय के विरुद्ध उकसावन होता है, या फिर किसी नेता, अभिनेता, या सामाजिक कार्यकर्ता के नाम से कोई झूठी बात जोड़ दी जाती है। वीडियो के पीछे कोई स्रोत नहीं, कोई प्रमाण नहीं, कोई तर्क नहीं — केवल भावनात्मक भाषा, संगीत और भ्रामक चित्रण होता है। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे वीडियो समूहों में तेजी से फैल जाते हैं। और फैलाने वाले शायद सोचते भी नहीं कि उनका यह एक क्लिक कितनी बड़ी अफवाह, नफरत या भ्रम का कारण बन सकता है।
अत्यंत चिंता का विषय यह है कि ये वीडियो फारवर्ड करने वाले अधिकांश लोग अपने बच्चों को वह “ज्ञान” देने में संकोच करते हैं जो वे दूसरों को भेजते हैं। कारण स्पष्ट है — या तो उन्हें खुद उस बात पर भरोसा नहीं होता, या फिर उन्हें पता होता है कि यह बात झूठ पर आधारित है, लेकिन अपनी “जागरूकता” दिखाने के लिए वे इस डिजिटल अपराध में भागीदार बन जाते हैं। यह मानसिक रूप से दिवालियापन नहीं तो और क्या है?
जब कोई व्यक्ति यह मान बैठता है कि उसे हर बात पर सोचने-समझने की ज़रूरत नहीं, कि जो स्क्रीन पर दिख रहा है वही सत्य है — तो वह धीरे-धीरे विवेकहीनता की ओर बढ़ने लगता है। ऐसी मानसिकता उस अवस्था की ओर संकेत करती है जिसे हम मानसिक दिव्यांगता कह सकते हैं। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति तर्क, जांच और विवेक को त्यागकर केवल भावनाओं और पूर्वाग्रहों के सहारे निर्णय लेने लगता है। दुर्भाग्यवश, ऐसे लोग न केवल स्वयं को धोखा देते हैं बल्कि समाज और देश के लिए भी संकट पैदा कर देते हैं।
आज जब देश आंतरिक और बाह्य चुनौतियों से जूझ रहा है, तब सूचना की शुद्धता और पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक हो जाती है। लेकिन जब झूठ को बार-बार दोहराया जाता है, तो वह झूठ भी कई लोगों के लिए सच बन जाता है। यही कारण है कि अफवाहों के कारण दंगे भड़कते हैं, निर्दोष लोग पीटे जाते हैं, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलता है, और राजनीति अपने गंदे खेल खेलने लगती है।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि आखिर इस मानसिक और सामाजिक संक्रमण का समाधान क्या है? इसका उत्तर है डिजिटल साक्षरता और विवेकशील नागरिकता। हमें यह सिखाना होगा कि हर वीडियो या संदेश को आँख बंद कर स्वीकार करना ही नागरिकता नहीं है, बल्कि सत्य और असत्य में भेद करना, गलत को आगे बढ़ने से रोकना, और सोशल मीडिया पर भी एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाना ही सच्चा देशभक्त होना है।
समय आ गया है कि हम ‘फॉरवर्ड करने से पहले सोचें’। एक क्लिक से अफवाह फैलाने के बजाय एक क्लिक से सत्य की खोज करें। अगर कोई वीडियो या संदेश आपको विचलित करता है, क्रोध से भर देता है या किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नफरत पैदा करता है, तो सबसे पहले उसे रोकिए, परखिए और अगर वह असत्य है, तो उसका प्रतिवाद कीजिए। यह केवल नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
आज के व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के ‘पाठ्यक्रम’ में झूठ, अफवाह और दुष्प्रचार ही ‘टॉप रैंकर्स’ हैं। हमें इन्हें विफल करना है। हमें अपने विवेक को पुनः जाग्रत करना है। अन्यथा, हम सब अनजाने में एक ऐसे सुनियोजित अराजकता के उपकरण बन जाएंगे, जो देश को भीतर से खोखला कर सकती है।
सच को पहचानना और झूठ को अस्वीकार करना, आज का सबसे बड़ा डिजिटल धर्म है। आइये, इस धर्म का पालन करें।
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