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काशीपुर की राजनीति: जब सत्ताधारी भाजपा नेता निभा रहे हैं विपक्ष की भूमिका,विपक्षी दल कांग्रेस के नेता असमंजस में विपक्ष में है कौन?

@विनोद भगत

काशीपुर की राजनीति इन दिनों विचित्र मोड़ पर खड़ी है। जहाँ एक ओर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पकड़ स्थानीय निकायों से लेकर नगर निगम तक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी दल के भीतर ही गहराते मतभेदों ने राजनीति को नया रंग दे दिया है। इन मतभेदों ने एक ऐसा परिदृश्य रच दिया है जहाँ भाजपा के ही नेता विपक्ष की भूमिका में नज़र आ रहे हैं — और यह दृश्य किसी राजनीतिक व्यंग्य से कम नहीं है।

ताजा उदाहरण मेयर और पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा के बीच चल रही बयानबाजी का है। दोनों ही भाजपा से जुड़े हुए हैं, लेकिन उनके बीच सार्वजनिक रूप से चल रही खींचतान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वास्तव में विपक्ष की भूमिका कौन निभा रहा है — कांग्रेस या खुद भाजपा?

पूर्व विधायक चीमा, जो दो दशक तक विधायक रह चुके हैं अब अपनी ही पार्टी के निर्वाचित मेयर जिनके लिए उन्होंने खुद जनता से अपील की थी कि उन्हें भारी मतों से विजयी बनायें। अब उसी मेयर के कामकाज पर सीधे सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, मेयर का पलटवार भी कुछ कम तीखा नहीं होता। वह चीमा को पितातुल्य बताकर उनके बयान की जोरदार काट करते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि भाजपा के भीतर सत्ता के दो ध्रुव बन चुके हैं, जो आलोचना से भी परहेज नहीं कर रहे।

इस पूरी स्थिति में सबसे हास्यास्पद स्थिति कांग्रेस की हो गई है। वर्षों से काशीपुर में संघर्ष कर रही कांग्रेस के पास अब कोई ठोस रणनीति नहीं दिख रही। जब विपक्ष की भूमिका खुद सत्ता पक्ष के लोग निभा रहे हों तो पारंपरिक विपक्ष की जगह कहाँ बचती है? कांग्रेस के स्थानीय नेता असमंजस में हैं — बोलें तो क्या बोलें, और चुप रहें तो क्यों चुप रहें। उनका अस्तित्व, जो विपक्ष की भूमिका निभाकर राजनीतिक पुनर्जीवन की उम्मीद में था, अब सवालों के घेरे में है।

यह परिदृश्य केवल राजनीतिक मज़ाक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय है। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर ही आरोप-प्रत्यारोप का खेल सार्वजनिक रूप से चलता है, तो जनता का भरोसा दोनों पक्षों से डगमगाने लगता है। जो मुद्दे वास्तव में विपक्ष को उठाने चाहिए, जैसे — नगर की सफाई, जल निकासी की व्यवस्था, सड़कें, यातायात व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ — वे अब भाजपा के गुटीय विवादों में गुम हो गए हैं। हालांकि इन्हीं मुद्दों को लेकर पूर्व विधायक चीमा ने मेयर दीपक बाली पर हमला बोला था। यह पहली बार है कि अपनी ही पार्टी के जनप्रतिनिधि के विकास कार्यों पर प्रश्न चिन्ह लगाये गये हैं। दरअसल मेयर दीपक बाली ने काशीपुर में विपक्षी पार्टी कांग्रेस को कोई मौका अपनी आलोचना का नहीं दिया है अभी तक।

ऐसा लगता है कि काशीपुर में विपक्ष की भूमिका अब मुद्दों की बजाय व्यक्तिगत रंजिशों और गुटबाज़ी में उलझ गई है। जहाँ एक ओर यह दृश्य भाजपा की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिचायक भी हो सकता है, वहीं यह भी सत्य है कि इससे जनता को कोई लाभ नहीं हो रहा। वाद-विवाद की यह श्रृंखला विकास के रास्ते में रोड़ा बन रही है और आम नागरिकों के मुद्दे राजनीतिक धुएँ में कहीं गुम होते जा रहे हैं। फिलहाल का माहौल तो यही दर्शा रहा है।

काशीपुर की मौजूदा राजनीतिक स्थिति हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या विपक्ष की भूमिका केवल दलगत होती है, या कोई भी नेता यदि जनता के हित में सत्ता से सवाल करता है, तो वह विपक्ष बन जाता है — चाहे वह सत्ता पक्ष का ही क्यों न हो? यह स्थिति कांग्रेस के लिए चेतावनी है कि यदि वह अब भी सक्रिय नहीं हुई तो “विपक्ष” की भूमिका भी उसके हाथ से निकल सकती है। और भाजपा के लिए यह समय है कि वह आंतरिक संवाद को संगठन के भीतर सुलझाए, न कि जनता के समक्ष तमाशा बनाए। वरना राजनीति की इस ‘धुंध’ में काशीपुर की असली समस्याएँ कहीं खो जाएँगी।

 

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