@शब्द दूत ब्यूरो (16 मार्च 2024)
श्रीनगर। लोकसभा चुनाव में युवा वोटर जम्मू-कश्मीर में विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रासंगिकता और अस्तित्व को तय करने जा रहा है। सबसे ज्यादा साख नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) की दांव पर लगी हुई है। प्रदेश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती युवा मतदाताओं और युवा कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की ही है।
इससे पार पाने के लिए नेकां ने अपने युवा कार्यकर्ताओं के अलग-अलग समूह बनाकर उन्हें युवा मतदाताओं के साथ संपर्क पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा है। पार्टी उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला खुद नेकां की युवा इकाई के साथ लगातार इस विषय में संवाद कर फीडबैक ले रहे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेकां जानती है कि 45 वर्ष की आयु से अधिक के वोटरों में उसकी पकड़ है, लेकिन वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) में आए बदलाव को देख युवाओं का कहीं न कहीं नेकां से मोह भंग हुआ है। कश्मीरी युवा अपने भविष्य को लेकर जम्मू-कश्मीर के स्थानीय दलों के बजाए केंद्र की नीतियों से प्रभावित लगते हैं।
अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद जम्मू-कश्मीर में पहली बार लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यह चुनाव इसलिए भी पहले से भिन्न हैं कि इस बार प्रदेश के सभी पांच संसदीय क्षेत्रों को स्वरूप परिसीमन के बाद पूरी तरह बदल चुका है। पुराने राजनीतिक नारे भी अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं।
नेकां जो कभी जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर एकछत्र राज करती थी, उसके लिए अब वर्चस्व बहाल रखना मुश्किल हो चुका है। अब वह पांच के बजाय तीन सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है। अन्य दो सीटें उसने कांग्रेस के लिए छोड़ने का फैसला किया है, क्योंकि अगर वह इन सीटों पर हारती है तो कह सकेगी कि कांग्रेस हारी है।
जिन तीन सीटों पर वह चुनाव लड़ने जा रही है वहां भी उसके लिए करो या मरो की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए वह युवा मतदाताओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। उमर ने नेकां की युवा इकाई के सभी प्रमुख पदााधिकारियों की गत रोज एक बैठक बुलाई और उनके साथ युवा मतदाताओं को विशेषकर नए मतदाताओं को नेकां के पक्ष में मतदान केंद्र तक लाने की रणनीति पर चर्चा की।
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