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आज के दौर में बाल कविताएं ,बाल पत्रिकाएं: रूझान में कमी आखिर क्यों? शिक्षक और कवि त्रिलोचन जोशी का गंभीर व सार्थक चिंतन

लेखक -त्रिलोचन जोशी

*बाल कविताएं*

थोड़े अर्थात नपे तुले हुए शब्दों से मन के भावों को अभिव्यक्त करने साहित्यिक विधा बाल कविता कहलाती है जो बच्चों के मनोरंजनार्थ लिखी जाती हैं।बाल कविताओं के माध्यम से समाज में संस्कार की पौध को रोपित किया जाता हैं। बाल्यकाल सीखने का आदर्श काल होता है,इस उम्र में बच्चे को पढ़ाया, लिखाया समझाया उसे दीर्घकाल तक याद रखता है।बचपन में जब बच्चे सोते नही है तो मां लोरी गाकर सुनाती हैं जिससे बच्चा सो जाता है और उस लोरी में छिपे हुए संदेश को लंबे समय तक याद रखता है।बच्चो के मस्तिष्क का समग्र और सकारात्मक विकास कर भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए बाल कविताओं अतिआवश्क होती हैं।सीधी और सरल भाषा में कही गई बाल कविताएं बच्चो के भाषाई और संज्ञानात्मक कौशल को बढ़ावा देती हैं।बाल कविताओं में सीख,संदेश,उपदेश,आदर्श, प्रकृति से जुड़ाव आदि उद्देश्य निहित होते है।

अच्छी बाल कविताएं बच्चो के शब्दकोश को सबल करने के साथ-साथ उच्चस्तरीय चिंतन क्षमता का विकास करती है जिससे उनका सर्वांगीण विकास हो पाता है।बच्चों में पनप रही गलत प्रवृत्तियों,नशे की आदत,चिड़चिड़ापन दूर करने में बाल कविताओं का सकारात्मक प्रभाव हो सकता है।

*मौजूदा दौर में बाल कविताएं*

आजकल के बचपन का रुझान बाल कविताओं की तरफ कम देखा जा रहा है जबकि अनेक साहित्यकारों द्वारा उच्चस्तरीय बाल साहित्य का सृजन किया जा रहा है। वर्तमान बच्चो के पास मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रानिक गजट उपलब्ध हो जा रहे हैं वह कविता वाचन के स्थान पर मोबाइल,कंप्यूटर,लेपटॉप पर गेम खेलना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। एक समय था जब माता पिता अपने नन्हे मुन्नों के मुंह से कविता सुनने पर प्रसन्न होते थे परंतु आजकल व्यस्तता के दौर में अपने पाल्यो के हाथ में मोबाइल पकड़वाकर अपने कार्य संपादित कर रहे हैं।दादा दादी नाना नानी के पास बैठकर किस्से कहानियां,आने काथे सुनने का अवसर अब नहीं दिखाई दे रहा है।उचित प्रेरणा ना मिल पाने के कारण बचपन बंद कमरे में अंगुलियों से चार इंच के ग्राउंड में चल रहे इंडोर गेम में व्यस्त दिखाई दे रहा है।बाल कविताओं से दूर बच्चों की रुचियां केवल गैजेट की तरफ केंद्रित हो गई हैं।

*मौजूदा दौर में बाल कविताओं की तरफ रुझान में कमी के कारण*

वर्तमान में शैक्षिक गतिविधियां और दिए जाने वाले गृह कार्य का स्वरूप बदल गया हैं। बच्चों को स्वच्छंद रूप से अपनी सुंदर लय ताल में कविताओं को पढ़ने गाने का अवसर नही मिल पा रहे हैं।
माता-पिता को अपने बच्चों से कविताएं सुनने के स्थान में टेलीविजन में चल रहे गानों में नृत्य करते हुए देखने में आनंद की अनुभूति होती है।
स्कूल के पुस्तकालयों में बाल साहित्य के स्थान पर अन्य प्रकार की पुस्तकें भेजी जाती हैं।
अविभावको द्वारा अपने नन्हें मुन्नों पर डॉक्टर,इंजीनियर बनाने का दबाब बनाया जा रहा है उनकी महत्वाकांक्षाएं पाल्यों पर अति शिक्षा का बोझ डाल रही हैं।नर्सरी,के जी के बच्चे 12बजे स्कूल से आकर 2बजे से ट्यूशन कक्षा के लिए भेजे जा रहें हैं।गणित,इंग्लिश,एनवायरनमेंट, कंप्यूटर कोडिंग आदि विषयों में स्कूली गृह कार्य अलग होता है और ट्यूशन का कार्य अलग। बच्चे इन्ही सब में व्यस्त हो जाते हैं।उसके बाद जो भी समय बचता है उसे बच्चे कार्टून देखने,यू ट्यूब में गाने सर्च करते दिखाई देते हैं।बच्चे खाना खाते समय भी टेलीविजन के कार्टून चैनल में इस कदर खो जाते है उन्हें यह आभास नहीं रहता है हाथ से उठाया गया ग्रास मुंह में जाएगा या नाक में। इस तरह के कार्यों से बालपन की मानसिकताएं ही परिवर्तित हो गई है जो उन्हें कारामाती/जादुई दुनिया की ओर अग्रसर करती दिखाई देती है।उन्हें बाल कविताओं के स्थान पर आभासी दुनिया के एलियन ज्यादा पसंद आते हैं। पुस्तक पढ़ने के लिए समय और धैर्य दोनों की आवश्यकता होती है जो आज कल के बच्चों में नही दिखाई देता है। बच्चो में क्रोध,आक्रोश, जिद और गाली गलौज वाली शब्दावली बढ़ रही है।उनका कोमल मन सरलता निश्छलता को खोता जा रहा है।
बाल कविताओं से संबंधित पत्र पत्रिकाएं पुस्तक विक्रेताओं के पास क्रेता ना होने के कारण कम पाई जा रही हैं।चंपक,नंदन पढ़ने का दौर एक तरह से समाप्त सा हो गया है।

*बाल कविताओं को कैसे बढ़ावा मिले*

बाल कविताओं को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में अध्यापकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है उनके द्वारा प्रारंभिक कक्षाओं में तरह तरह की बाल कविताएं बच्चो को सिखाई जानी चाहिए तथा पुस्तकालयों में अधिक से अधिक बाल साहित्य रखा जाना चाहिए और बच्चों को पढ़ने के दिया जाना चाहिए।स्कूलों में आयोजित होने वाले प्रतिभा दिवस के अवसर पर बाल कविताओं से संबंधित गतिविधियां संपादित करनी आवश्यक हैं।उन्हें इस विधा से जोड़ने के लिए तुकबंदी वाली रचनाए लिखने को कहा जा सकता है। अभिभावकों को अपने पाल्योँ को गैजेट के बजाय पुस्तके पढ़ने के लिए समय देना चाहिए उन्हें स्वयं भी बच्चो के समक्ष कविताओं को उच्चारित करना चाहिए।अविभावकों को चाहिए कि वह अपने घर के काम करते करते बच्चों से कविता कहानी पढ़ने और याद कर सुनाने को कहें,अकेलेपन में उनके बच्चों की दोस्त किताबें बन पाएं।

बाल साहित्य के लेखकों को परिवर्तित बालमन के अनुसार बाल कविताओं का सृजन करना होगा। साहित्यकारों द्वारा अपनी रचनाओं को बाल आकर्षण देकर और उनमें जीवन मूल्यों को जोड़ते हुए उनकी रुचियों को जाग्रत किया जा सकता है।
अबोध मन को जगाने के लिए साहित्यकारों,शिक्षकों,अविभावकों तथा शैक्षिक नीतियों को मिलकर कार्य करना होगा।

-त्रिलोचन जोशी(टी०सी०गुरु) 
गणित शिक्षक
रा०उ०मा०वि०छीनीगोठ (टनकपुर)

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