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टीवी के देवकांत बरुआ@देश में चमचत्व के नित नए कीर्तिमान बन रहे, वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की खरी खरी

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

आज के जमाने के पाठक शायद नहीं जानते होंगे कि देवकांत बरुआ कौन थे ? देवकांत बरुआ कांग्रेस के एक ऐसे नेता थे जिन्होंने ‘चमचत्व’ को सबसे ज्यादा ऊंचाई देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को ‘इंदिरा इज इंडिया ‘कहा था .देवकांत बरुआ के बाद चमचत्व में देश ने नए -नए कीर्तिमान गढ़े.अब नेताओं को देश नहीं बल्कि भगवान का अवतार तक बताया जाने लगा है .राजनीतिक दलों की ही तरह अब टीवी चैनलों में भी देवकांत बरुआ सक्रिय हो गए हैं जो गुजरात और हिमाचल में अभी से भाजपा की सरकार बना चुके हैं .

गुजरात और हिमाचल भाजपा शासित देश हैं इसलिए स्वाभाविक है कि इन दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा की ही सरकारें बनना चाहिए ,लेकिन ये काम जनता का है. इन राज्यों में चुनावों की घोषणा से पहले ही हमारी टीवी जनता का मूड भांपकर ऐलान कर चुकी है कि इन दोनों राज्यों में भाजपा कि ही वापसी होगी .सवाल ये है कि भाजपा से ज्यादा उतावलापन हमारे न्यूज चैनल क्यों हैं भाजपा की सरकारें बनवाने के लिए ?

एवीपी न्यूज ने पहल करते हुए सी-वोटर से इन दोनों राज्यों के लिए चुनावी सर्वे करा लिया और बता दिया कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी गुजरात में 1995 के बाद से रिकॉर्ड 7वीं बार चुनाव जीतने वाली है. बीजेपी का 135-143 सीटें जीतने का अनुमान है, जो 2017 की कुल 99 सीटों से बहुत ज्यादा है.दरअसल अब टीवी चैनलों ने अपने -अपने पंचांग बना लिए हैं जिनके सहारे वे चुनावों को लेकर भविष्यवाणी करते रहते हैं .आजकल टीवी चैनलों का राष्ट्रीय कर्तव्य ही सत्तारूढ़ दलों को जिताना होता है .

चुनावी सर्वे कोई नया काम नहीं रह गया है ,लेकिन चुनावों से पहले सत्तारूढ़ दल के लिए श्वानों की तरह भौंकते टीवी चैनल चुनाव से पहले ही माहौल बनाने में क्यों लग जाते हैं .आएसा लगता है जैसे चुनाव सत्तारूदल नहीं बल्कि टीवी चैनल खुद लड़ रहे हों ! टीवी चैनलों का उतावलापन देखकर लगता है कि अब इन्हें भी चुनाव मैदान में उत्तर जाना चाहिए .टीवी चैनलों को तो ये सर्वे कंपनियां खुद ही जिता देंगीं .जनता की तो कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी .

टीवी चैनलों के पंचांग कहते हैं कि सड़क पर संघर्ष कर रही कांग्रेस तो इन होने वाले चुनावों में और पिटने वाली है. सी -सर्वे ने गुजरात में आम आम आदमी पार्टी को एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में पेशकिया गया है सर्वे कहता है कि आप की चुनौती के परिणामस्वरूप, बीजेपी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ) के वोट शेयर 2017 के स्तर से नीचे गिरने की संभावना है. अनुमानों के अनुसार, बीजेपी को वोट शेयर का 46.8 फीसदी (2017 में 49.1 फीसदी से नीचे) प्राप्त होगा

गुजरात में बीजेपी जीते या न जीते इससे क्या फर्क पड़ने वाला है .गुजरात में एक रात बिताकर आइये आपको सारी हकीकत का पता चल जाएगा.गुजरात की जनता पर क्या गुजर रही है ,ये जानने के लिए आजतक कोई सर्वे नहीं किया गया. इसकी जरूरत ही नहीं है. न सत्तारूढ़ दल के लिए और न बीजेपी के लिए .अब लगता है कि चुनाव की हार और जीत किसी राजनीतिक दल पर नहीं अपितु सी वोटर के ऊपर है..सबकी अपनी-अपनी विवशता होती है.

सी वोटर को अपने क्लाइंट्स के लिए काम करते हुए लंबा समय हो चुका है. अच्छी बात ये है कि सी वोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख की कोई अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है. वे जो संस्थान पैसा देता है उसके लिए सर्वे करके दे देते हैं .क्लाइंट की खुशी के लिए सर्वे में ईमानदारी कम ,बेईमानी ज्यादा करना पड़ती है .सी वोटर सबके लिए सर्वे करता है. अख़बारों के लिए भी और टीवी चैनलों के लिए भी. सी वोटर सभी तरह का सर्वे करता है सी वोटर व्यावसायिक संस्था है. अब तक ये संस्था देश के 15 बजटों का विश्लेषण करने के साथ ही राज्य विधानसभा चुनावों के सौ से ज्यादा चुनावों का सर्वे कर चुका है .सी वोटर के साथ इंडिया टुडे समूह अपने संबंध भी तोड़ चुका है,क्योंकि संस्था ने काम करने में बेईमानी की थी,

बहरहाल अकेले सी वोटर ही नही तमाम दूसरी संस्थाएं भी चुनाव के पहले और चुनाव के बाद सर्वे करतीं हैं .इनमें कभी-कभी नतीजे एकदम सटीक बैठते हैं और कभी एकदम विपरीत.कभी तीर में तुक्का लगता है और कभी नहीं भीं .लेकिन ये सर्वे जनमत को प्रभावित करने के बजाय दूषित करते हैं ऐसा मेरा मानना है.मुमकिन है कि आप में से कोई भी मुझसे सहमत न हो ,किन्तु जो है सो है .लोकतंत्र में इस तरह के सर्वे चुनाव प्रणाली और जनमत दोनों के खिलाफ काम करते हैं. अरे भाई इतना भी क्या उतावलापन है कि आप चुनावों की घोषणा के पहले ही बता देना चाहते हैं कि कहाँ,कौन सा माहौल है?

देश में आजादी के बाद चुनाव में तमाम तब्दीलियां आयीं हैं. पहले चुनाव सचमुच चुनाव होते थे,अब चुनाव ‘ ईवेंट ‘ हैं. चुनाव लगातार मंहगे हो रहे हैं .चुनाव में लकधक लगातार बढ़ रही है .प्रत्याशी का ही नहीं बल्कि राजनीतिक दलों का खर्च भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है ऐसे में यदि चुनावों को ये तथाकथित सर्वे भी प्रभावित करने लगेंगें तो कल्पना कीजिये कि आने वाले दिनों में चुनावों की क्या सूरत बनने वाली है ?इन सर्वे पर भरोसा करना या न करना अलग बात है लेकिन इनके जरिये वातावरण को प्रभावित करने की कोशिश करना अलग बात है .एक जमाने में जब सीवोटर न था तब हम लोग भी अपने अखबारों के लिए चुनाव सर्वे करते थे ,लेकिन वो आज के होने वाले सर्वेक्षणों से एकदम अलग होता था .
@ राकेश अचल

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