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वो मुगल बादशाह जो शराब, अफीम और संगीत के लिए चर्चा में रहा

@शब्द दूत ब्यूरो (11 सितंबर, 2022)

*साल 1707 में औरंगजेब की मौत हुई। मुगल साम्राज्य का अस्तित्व खतरे में आने लगा, तब मुहम्मद शाह रंगीला ने उसे संभाला। मुहम्मद शाह के दौर में संगीत और कला को विशेष महत्व दिया गया।*

मुगल काल में एक ऐसा दौर भी देखा गया जब संगीत पर पाबंदी लगी। संगीतकारों के भूखे मरने के दिन आ गए। वाद्ययंत्र धूल खाने लगे। चारों तरफ संगीत का स्वर सुनाई देना बंद हो गया। वो दौर था औरंगजेब का। इतालवी पर्यटक मनूची अपने संस्मरण में लिखते हैं कि मुगल बादशाह औरंगजेब के दौर में संगीत पर पाबंदियों से तंग आकर कलाकारों ने अपने अंदाज में विरोध जताने की योजना बनाई। करीब एक हजार संगीतकार दिल्ली की जामा मस्जिद पर इकट्ठा हुए।

जुलूस की शुरुआत हुई। विरोध जताने वालों ने ऐसे रोते-गाते हुए आगे बढ़ना हुए मानो किसी का जनाजा निकल रहा हो। इस बीच नमाज के बाद वापस लौट रहे औरंगजेब की नजर इन पर पड़ी तो पूछा ऐसा क्यों कर रहे हो। प्रदर्शनकारियों का जवाब आया कि आपने संगीत का कत्लेआम कर दिया है। अब उसी संगीत को हम दफनाने जा रहे हैं। यह जवाब सुनने के बाद औरंगजेब में कहा- ऐसा है तो कब्र जरा गहरी खोदना।

संगीत पर पाबंदी के दौर में औरंगजेब के परपोते बादशाह मुहम्मद शाह का जन्म हुआ जिसे रंगीले बादशाह के नाम से भी जाना गया। उस दौर में भी दिल्ली की हुकूमत की बागडोर परदादा औरंगजेब के हाथों में ही थी। औरंगजेब ने कट्टर इस्लाम को लागू किया। उसका मानना था कि कलाकार इस्लाम में बताए गए उसूलों का पालन नहीं करते। यही संगीत पर सख्ती की बड़ी वजह थी।

उसने हिंदुस्तान में एक ख़ास क़िस्म का कट्टर इस्लाम लागू कर रखा था। इसका शिकार सबसे पहले वे कलाकार बने, जिनके बारे में राय थी कि वो इस्लामी उसूलों का पालन नहीं करते। मुहम्मद शाह का मिजाज अपने परदादा औरंगजेब से जुदा था। मुहम्मद शाह को संगीत और कला को बढ़ावा देने के साथ शराब और अफीम का नशा करने के लिए भी जाना गया।

साल 1707 में औरंगजेब की मौत हुई और मुगल साम्राज्य का अस्तित्व खतरे में आने लगा, तब मुहम्मद शाह रंगीला ने उसे संभाला। मुहम्मद शाह के दौर में संगीत और कला को विशेष महत्व दिया गया। जो कला औरंगजेब के काल में मुरझा गई थी उसे मानों दोबारा पंख मिल गए। इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल लिखते हैं कि यूं तो मुहम्मद शाह रंगीला और बहादुर शाह जफर कोई ऐसे मुगल सम्राट नहीं थे जिन्हें सफल बादशाह में गिना जा सके, लेकिन उनके कार्यकाल में कला को बढ़ावा दिया गया और इस क्षेत्र में कई असाधारण काम किए गए।

कहा जाता है कि उस दौर में हिन्दू और मुस्लिम के बीच की दीवार बारीक हो गई थी। खुद बादशाह दरबारियों के साथ होली खेलते थे। मुस्लिम और हिन्दू संत बात करते हुए नजर आते थे।

मुहम्मद शाह रंगीला के शासन में ही उसके नामर्द होने की अफवाह फैली। इस अफवाह को गलत साबित करने के लिए मुहम्मद शाह रंगीला ने एक पेंटिंग बनवाई थी, जिसमें उसे एक दासी के साथ सम्बंध बनाते हुए दिखाया गया था। उस दौर की वो पेंटिंग काफी चर्चा में रही थी।

कवियों, चित्रकारों और संगीतकारों को हमेशा मुहम्मद शाह रंगीला की तरफ से बढ़ावा मिला, यही वजह है कि उस दौर के कलाकारों को विशेष प्रसिद्धी मिली। नतीजा, दिल्ली विद्वानों, धर्म कवियों, चित्रकारों, संगीतकारों और नर्तकियों का केंद्र बन गया।

मुहम्मद शाह का बचपन का नाम रोशन अख्तर था। 29 सितंबर 1719 को सिंहासन पर बैठने के बाद उसे अबु अल फ़तह नसीरूद्दीन रोशन अख़्तर मुहम्मद शाह नाम दिया गया। लेकिन बादशाह ने अपना उपनाम सदा रंगीला रखा था। नतीजा धीरे-धीरे उसे लोग मुहम्मद शाह रंगीला करकर बुलाने लगे।

उस दौर के हालात को मुहम्मद शाह रंगीला के दरबारी रहे कुली खान ने अपनी किताब मरकए दिल्ली में बयां किया है। कुली खान लिखते हैं कि दिल्ली के लोग उस समय बड़ी इत्मिनान की जिंदगी जी रहे थे। धार्मिक स्थानों पर भीड़ लगी रहती थी।

एक दौर ऐसा भी आया जब मुहम्मद शाह को शराब और अफीम की लत खोखला करने लगी। उन्हें अचानक दौरा पड़ा। जिसके बाद हकीमों में बादशाह को हयात बख्श बाग भेज दिया। प्राकृतिक खूबसूरती से भरपूर इस बाग से सेहत में सुधार होने की बात कही जाती थी, लेकिन हालत इतनी ज्यादा बिगड़ चुकी थी कि बादशाह को राहत नहीं मिली। एक रात ऐसी भी आई जब पूरी रात बादशाह बेहोश रहा। मात्र 46 साल के बादशाह ने 26 अप्रैल, 1748 को दम तोड़ दिया। मौत के बाद उसे अमीर खुसरो के बराबर में ही दफन किया गया।

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